Monday, September 28, 2015

काशी के पिशाच मोचन कुंड में शुरू हुआ त्रिपिंडी श्राद्ध

पितृ पक्ष के पहले दिन सोमवार से ही काशी के पिशाच मोचन कुंड पर त्रिपिंडी श्राद्ध शुरू हो गया है। मान्यता के अनुसार, काशी के प्राचीन पिशाच मोचन कुंड पर होने वाले त्रिपिंडी श्राद की से पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मरने के बाद विकारों से मुक्ति मिल जाती है। इसीलिए पितृ पक्ष के दिनों तीर्थ स्थली पिशाच मोचन पर लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है। यह भी मान्‍यता है कि वाराणसी में पिंड दान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है क्योंकि काशी भगवान शिव की नगरी है।
बताते चलें कि 12 महीने चैत्र से फाल्गुन तक 15- 15 दिन का शुक्ल और कृष्ण पक्ष का होता है, लेकिन आश्विन मास के कृष्ण पक्ष से शुरू होता है। पितृ पक्ष के 15 दिन पितरों की मुक्ति के माने जाते हैं और इन 15 दिनों के अंदर देश के विभिन्न तीर्थ स्थलों पर श्राद और तर्पण का कार्य होता है। इसके लिए काशी के अति प्राचीन पिशाच मोचन कुंड पर त्रिपिंडी श्राद होता है। यह पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मरने के बाद विकारों से मुक्ति दिलाता है। इस श्राद कार्य में इस पवित्र तीर्थ पर संस्कृत के श्लोकों के साथ तीन मिट्टी के कलश की स्थापना की जाती है, जो काले, लाल और सफेद झंडों से सजाए जाते हैं।
तीन तरह की होती हैं प्रेत बाधाएं
प्रेत बधाएं तीन तरीके की होती हैं। इनमें सात्विक, राजस, तामस शामिल हैं। इन तीनों बाधाओं से पितरों को मुक्ति दिलवाने के लिए काला, लाल और सफेद झंडे लगाए जाते हैं। इसको भगवान शंकर, ब्रह्म और कृष्ण के ताप्‍तिक रूप में मानकर तर्पण और श्राद का कार्य किया जाता है। इस पिशाच मोचन तीर्थ स्थल का वर्णन गरुण पुराण में भी वर्णित है।
मानव शरीर से भगाए जाते हैं भूत-प्रेत
पुरोहितों ने बताया कि यहां अपने पितरों के साथ-साथ अन्य पिशाच बाधाएं भी दूर की जाती हैं, जिनका प्रमाण सिर्फ देखने से मिलता है जिसमे प्रमुख रूप से महिला ओझा पुरोहितों के साथ बैठकर भूतों से कबूल करवाती हैं कि वह दुबारा उस मानव शरीर को परेशान नहीं करेगा। इसके लिए लोग यहां स्थित पीपल के पेड़ में उस भूत के नाम का सिक्का गाड़ते हैं। मान्यता है की वह भूत यही रहेगा और परेशान नहीं करेगा। इस बात की पुष्‍टि जौनपुर से आए एक दंपत्‍त‍ि ने की। उन्‍होंने बताया कि उनकी पत्नी विगत एक शाल से परेशान थी, जिसको लेकर वह यहां आए हैं।

क्‍या कहते हैं पुरोहित
प्रधान तीर्थ पुरोहित कृष्ण कुमार अनुसार, पितरों के लिए 15 दिन स्वर्ग का दरवाजा खोल दिया जाता है। उन्होंने बताया कि यहां के पूजा-पाठ और पिंड दान करने के बाद ही लोग गया के लिए जाते हैं। उन्‍होंने बताया कि जो कुंड वहां है वो अनादि काल से है भूत-प्रेत सभी से मुक्ति मिल जाती है।




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