Wednesday, October 12, 2016

नाटी इमली का भरत-मिलाप

चित्रकूट की लीला अश्विन कृष्ण नवमी से होता है। मुकुट पूजन के बाद राज्याभिषेक की तैयारी से लीला आरम्भ होती है। इन लीलाओं में नाटी इमली में बाल भरत-मिलाप सबसे महत्वपूर्ण होता है। इसमें भूतपूर्व काशी नरेश भी सम्मिलित होते हैं। भरत-मिलाप एक संक्षिप्त लीला या झाँकी मात्र है। इसमें राम-जानकी एवं लक्ष्मण बनवासी वेश में एक मंच पर खड़े रहते हैं, उनके आगमन को सुनकर भरत जो राम के समान ही तपस्वी वेश में हैं तथा शत्रुघ्न आते हैं और राम के चरणों पर गिर जाते हैं। राम एवं लक्ष्मण उन्हें उठाते हैं तथा चारों परस्पर मिलते हैं। तत्पश्चात पाँचों स्वरुपों को विमान या रथ पर बिठाकर ढोया जाता है। विमान को काशी के व्यापारी वर्ग इस विश्वास से ढोते हैं कि उनका व्यापार अच्छा चलेगा। ऐसा विश्वास किया जाता है कि भरत-मिलाप के समय मेधाभगत को स्वरुपों में साक्षात भगवान के दर्शन हुए थे। आज भी क्षण भर के लिए स्वरुपों में इश्वरत्व आ जाता है, ऐसा विश्वास है।
जिस दिन अर्थात विजयादशमी के दूसरे दिन, नाटी इमली का भरत-मिलाप होता है उस दिन यहाँ के सम्मान में काशी के अन्य स्थलों की रामलीला बन्द रहती है। काशी नरेश के उपस्थित होने के बाद ही नाटी इमली का भरत-मिलाप होता है। यहाँ भरत-मिलाप गोधूलि-बेला में सम्पन्न होता है।
यद्यपि भरत-मिलाप एक झाँकी मात्र है जो केवल पाँच मिनट में समाप्त हो जाती है, परन्तु इसे देखने के लिए अपार जन समूह एकत्र होता है। रामलीला प्रांगण एवं आस-पास के छतों पर विशाल जन समूह दिखाई पड़ता है। आज के दिन भीड़ नियन्त्रण की व्यवस्था प्रशासन करता है। 
विश्व प्रसिद्ध भरत मिलाप ,जो वाराणसी में नाटी इमली भरतमिलाप मैदान में सम्पूर्ण होती हैं। बनवास पूरी कर चारों भाई आपस में मिलते है, जहां सूर्य भगवान की लालिमा चारों भाइयों के मुख पर पड़ता हैं।























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