Wednesday, July 27, 2016

कर्दमेश्वर महादेव मंदिर

अर्द्धचंद्राकार रूप में प्रवाहित उत्तरवाहिनी मां गंगा के किनारे स्थित विद्या और संस्कृति की राजधानी काशी नगरी अपनी धार्मिक और पौराणिक स्थानों की विशाल संख्या और उनमें व्याप्त विविधता के लिए विश्वविख्यात है। काशी की महिमा का उल्लेख अनेक पुराणों में मिलता है। काशी की धार्मिक परंपराओें में यात्रा तथा यात्रा के दौरान काशी खंड में स्थित देवालयों में दर्शन-पूजन का विशेष महत्त्व है। इस क्रम में पंचक्रोशी यात्रा में पहले विश्राम के रूप में प्रसिद्ध है कर्दमेश्वर महादेव मंदिर। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से करीब 5 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण-पश्चिमी दिशा में यह मंदिर स्थित है। एक बड़े चतुर्भुजाकार तालाब के पश्चिमी ओर स्थित यह मंदिर उड़ीसा के विकसित मंदिरों सा प्रतीत होता है। साथ ही मूर्तिकला की संपन्नता लिए यह चंदेल इतिहास का प्रतीक है। कर्दमेश्वर मंदिर का उल्लेख पंचक्रोशी महात्म्य में कर्दमेश के तौर पर है। यहीं पर पंचक्रोशी यात्री अपना पहला पड़ाव या विश्राम करते हैं। एक कथा कर्दमेश्वर से अवश्य जुड़ी है। इस कथा के अनुसार एक बार जब प्रजापति कर्दम शिव पूजा में ध्यानमग्न थे। उनका पुत्र कुछ मित्रों के साथ तालाब में नहाने गया स्नान के दौरान उसे एक घडि़याल ने खिंच लिया। डरे हुए मित्रों ने यह बात कर्दम को बताई। कर्दम बिना बाधित हुए ध्यानमग्न रहे, परंतु ध्यानावस्था में ही वह पूरे विश्व के घटनाक्रम को देख सकते थे। उन्होंने देखा कि उनका पुत्र एक जल देवी द्वारा बचाकर समुद्र को सौंप दिया गया है। जिसे समुद्र में गहनों से सजाकर शिव के गण को सौंप दिया। शिवगण ने शिव आज्ञा से बालक को उसके घर पहुंचाया। ध्यानावस्था से उठने पर कर्दम ने अपने पुत्र को सम्मुख पाया कर्दम के यही पुत्र कर्दमी के नाम से जाने गए तथा पिता की आज्ञा से वाराणसी चले आए। कर्दमी ने एक शिवलिंग स्थापित कर पांच हजार वर्षों तक अत्यंत कठोर तप किया। शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें प्रत्येक स्रोत का स्वामी घोषित किया। एक अन्य वरदान में शिव ने कहा कि मणिकर्णेश के दक्षिण-पश्चिम स्थित जो लिंग है वह वरूणेश के नाम से जाना जाएगा। काशीखंड तथा तीर्थ विवेचन खंड यह दर्शाते है कि वरूणेश लिंग गड़वाल काल का है। जो बाद में कर्दमेश्वर नाम से जाना गया। कर्दमेश्वर मंदिर पंचरथ प्रकार का मंदिर है इसकी तल छंद योजना में एक चौकोर गर्भगृह अंतराल तथा एक चतुर्भुजाकार अर्द्धमंडप है। मंदिर का निचला भाग अधिष्ठान, मध्यभित्ति क्षेत्र मांडोवर भाग है जिस पर अलंकृत तांखे बने हुए हैं। ऊपरी भाग में नक्काशीदार कंगूरा वरांदिका व आमलक सहित सजावटी शिखर है। मंदिर का पूर्वाभिमुख मुख्य द्वार तीन फीट पांच इंच चौड़ा तथा छः फीट ऊंचा है। इसी गर्भृगृह के मध्य ही कर्दमेश्वर शिवलिंग अवस्थित है। गर्भगृह के ही उत्तर-पश्चिमी कोने में छः फीट की ऊचाई पर एक जल स्रोत है। जिससे शिवलिंग पर लगातार जलधारा गिरती रहती है। वास्तुशिल्प और मूर्तिशिल्प के आधार पर यह मंदिर बहुत ही रोचक है। आधार की अपेक्षा खंभे काफी हद तक सादे हैं। कर्दमेश्वर मंदिर के अर्द्धमंडप के दो स्तंभों पर अभिलेख है। जो 14वीं-15वीं शताब्दी से है। जिनसे पुष्ट होता है कि अर्द्धमंडप के निर्माण में पुरानी सामग्री को पुनः प्रयोग में लाया गया है। कर्दमेश्वर मंदिर पर बनी मूर्तियां शिल्प के दृष्टिकोण से सामान्य प्रकृति की है। वामन तथा विष्णु की मूर्तियों में बने आभूषणों में घुंघरू की उपस्थिति भी बहुत बाद की मूर्ति शिल्प विशेषता है। ऐसे ही पश्चिमी भाग पर खड़ी मुद्रा में विष्णु की मूर्ति के माथे पर यू आकार का चिन्ह है जो वर्तमान समय में भी प्रचलित है। निःसंदेह कर्दमेश्वर मंदिर पर उत्कीर्ण मूर्तियां तेजस्वी है 









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