Natraj Cinema Hall earlier located near sigra Varanasi. Now building gets totally demolished by the owner.
Thursday, November 3, 2022
Wednesday, May 25, 2022
वाराणसी का जन्म
24 मई 1956 के दिन 'वाराणसी' का हुआ था जन्म
प्रचीन से भी प्रचीन शहर के नाम से विख्यात बाबा भोलेनाथ की नगरी काशी के नए नाम वाराणसी का जन्म 24 मई 1956 तारिख में हुआ था। 24 मई 1956 के ही दिन वाराणसी नाम अस्तित्व में आया था। पौराणिक नगरी काशी का दूसरा नाम बनारस है तो तीसरा प्रचलित नाम वाराणसी। इसका वर्तमान स्वरूप भले ही प्राचीनता संग कुछ आधुनिकता लिए हो मगर पुरानी कथाएं इसकी भव्यता की कहानी स्वयं कहती हैं।
बता दें कि काशी और बनारस आदि नामों के बीच 24 मई, 1956 को प्रशासनिक तौर पर इसका वाराणसी नाम स्वीकार किया गया। इस दिन भारतीय पंचांग में दर्ज तिथि के अनुसार वैसाख पूर्णिमा, बुद्ध पूर्णिमा और चंद्रग्रहण का योग था। माना जा सकता है कि वाराणसी का नामकरण सबसे पुण्यकाल में स्वीकार किया गया था।
बता दें कि वाराणसी नाम बेहद पुराना है। इतना पुराना कि मत्स्य पुराण में भी इसका जिक्र है। वाराणसी गजेटियर, जो कि 1965 में प्रकाशित किया गया था, उसके दसवें पृष्ठ पर जिले का प्रशासनिक नाम वाराणसी किए जाने की तिथि अंकित है।
इसके साथ ही गजेटियर में इसके वैभव संग विविध गतिविधियां भी इसका हिस्सा हैं। गजेटियर में इसके काशी, बनारस और बेनारस आदि नामों के भी प्राचीनकाल से प्रचलन के तथ्य व प्रमाण हैं, लेकिन आजादी के बाद प्रशासनिक तौर पर 'वाराणसी' नाम की स्वीकार्यता राज्य सरकार की संस्तुति से इसी दिन की गई थी।
वाराणसी की संस्तुति जब शासन स्तर पर हुई तब डा. संपूर्णानंद मुख्यमंत्री थे। स्वयं डा. संपूर्णानंद की पृष्ठभूमि वाराणसी से थी और वो यहां काशी विद्यापीठ में अध्यापन से भी जुड़े रहे थे।
एक मत के अनुसार अथर्ववेद में वरणावती नदी का जिक्र आया है, जो आधुनिक काल में वरुणा का पर्याय माना जाता है। वहीं,अस्सी नदी को पुराणों में असिसंभेद तीर्थ कहा गया है। अग्निपुराण में असि नदी को नासी का भी नाम दिया गया है।
पद्यपुराण में भी दक्षिण-उत्तर में वरुणा और अस्सी नदी का जिक्र है। मत्स्यपुराण में वाराणसी का वर्णन करते हुए कहा गया है कि वाराणस्यां नदी पु सिद्धगन्धर्वसेविता। प्रविष्टा त्रिपथा गंगा तस्मिन् क्षेत्रे मम प्रिये। इसके अतिरिक्त भी विविध धर्म ग्रंथों में वाराणसी, काशी और बनारस सहित यहां के पुराने नामों के दस्तावेज मौजूद हैं।
सन 1965 में इलाहाबाद के सरकारी प्रेस से प्रकाशित गजेटियर में कुल 580 पन्ने हैं। यह आइएएस अधिकारी श्रीमती ईशा बसंती जोशी के संपादकीय नेतृत्व में प्रकाशित किया गया था। सरकार द्वारा दस्तावेजों को डिजिटल करने के तहत सन 2015 में इसे आनलाइन किया गया।
जबकि इसके शोध और प्रकाशन के लिए उस समय 6000 रुपए सरकार की ओर से प्रति गजेटियर रकम उपलब्ध कराई गई थी। वाराणसी गजेटियर में लगभग 20 अलग अलग विषय शामिल हैं।...
Wednesday, July 28, 2021
रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर
रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर जापान और भारत के आपसी सहयोग का प्रतीक है. 2015 में जब जापान के पीएम शिंजो अबे पीएम मोदी के साथ उनके संसदीय क्षेत्र वाराणसी आए थे, तभी इस कन्वेंशन सेंटर की नींव डाली गई.
क्या है खासियत
- 2.87 हेक्टेयर जमीन पर फैले इस कन्वेंशन सेंटर की छत शिवलिंग के आकार की है और इसमें एल्युमिनियम के 108 रुद्राक्ष लगाए गए हैं। इसमें एकसाथ 1,200 लोग बैठ सकते हैं।
- सेंटर को भारत तथा जापान की संस्कृति को ध्यान में रखकर बनाया गया है जिसमें फूल, बांस, कंकड़ चीनी मिट्टी के बर्तन, भूसे से सजावट की गई है। हाल को लोगों की संख्या के अनुरूप दो हिस्सों में बांटने की व्यवस्था है।
- पूर्णत: वातूनुकुलित सेंटर में बड़े हाल के अलावा 150 लोगों की क्षमता का एक मीटिंग हाल है। इसके अतिरिक्त यहां एक वीआइपी कक्ष, चार ग्रीन रूम भी हैं। पार्किंग सुविधा संग सीसीटीवी कैमरे हैं। सौर ऊर्जा की भी व्यवस्था की गई है।
- रुद्राक्ष में छोटा जैपनीज गार्डन बनाया गया है। 110 किलोवाट की ऊर्जा के लिए सोलर प्लांट लगा है। वीआईपी रूप और उनके आने-जाने का रास्ता भी अलग से है।
- रुद्राक्ष को वातानुकूलित रखने के लिए इटली के उपकरण लगे है। दीवारों पर लगे ईंट भी ताप को रोकते और कॉन्क्रीट के साथ फ्लाई ऐश का भी इस्तेमाल किया गया है।
Rudraksh International Convention Centre
Prime Minister Narendra Modi has inaugurated the International Cooperation and Convention Centre “Rudraksh”, in Varanasi, Uttar Pradesh. The centre will become an attractive destination for conferences and pull in tourists and businesspersons to the city. The international cooperation and convention centre has been named “Rudraksh” and has as many as 108 Rudraksha at the centre. Its roof is shaped like a ‘Shiva Linga’.
The objective is to provide opportunities for social and cultural interactions between people at the international convention centre. The convention centre has been built with the assistance from Japan International Cooperation Agency. An environment-friendly building, the centre is equipped with adequate security and safety systems. It features a regular entrance, a service entrance and a separate VIP entrance, making it an ideal destination for holding all types of international events.
Wednesday, November 11, 2020
गुरुबाग गुरुद्वारा , गुरुबाग
ऐक ॐकार सतनाम .....
गुरुद्वारा गुरुबाग गुरुनानक देव महाराज की चरण स्पर्श भूमि है।
गुरुनानक देव जी की यात्रा के बारे में बताते हुए गुरुद्वारा गुरुबाग के प्रमुख ग्रंथी श्री सुखदेव सिंह जी ने कहा कि फरवरी 1507 में शिवरात्रि के अवसर पर गुरु नानक देव वाराणसी की यात्रा पर आए थे। वर्तमान गुरुद्वारे के स्थान पर उस समय यहां सुंदर बाग था। इसी स्थान पर गुरु नानक देव शबद-कीर्तन कर रहे थे, जिससे प्रभावित होकर बाग के मालिक पंडित गोपाल शास्त्री उनके शिष्य बन गए और अपना बाग उन्हें अर्पित कर दिया। तभी से यहां का नाम सुंदर बाग की जगह गुरुबाग हो गया।
चतुरदास का भी मन निर्मल किया था
गुरुनानक देव जी की यहां यात्रा के दौरान कई विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित करने वाले पंडित चतुरदास ईष्र्यावश उनके पास पहुंचे। इस पर गुरुनानक ने मुस्कुराते हुए स्वयं कहा कि पंडित चतुरदास जी यदि आप को मुझसे कुछ प्रश्न करने हैं तो इस बाग के भीतर एक कुत्ता है, आप उसे यहां लाइए, वही आपके प्रश्नों का उत्तर देगा। हम इस वाद-विवाद के झमेले में पड़ना नहीं चाहते। गुरुजी का इशारा पाकर पंडित जी कुछ ही दूर गए थे कि उन्हें कुत्ता मिला, जिसे वे लेकर आए। गुरु नानक देव ने जब उस पर दृष्टि डाली तो कुत्ते के स्थान पर सुंदर स्वरूप धोती, जनेऊ, तिलक, माला आदि धारण किए एक विद्वान बैठा नजर आया। लोगों के पूछने पर उसने बताया कि मैं भी एक समय विद्वान था, लेकिन मेरे भीतर ईष्या व अहंकार भरा हुआ था। काशी में आने वाले सभी साधु, संत, महात्मा, जोगी, सन्यासी को अपने शास्त्रार्थ से निरुत्तर कर यहां से भगा देता था। एक बार एक महापुरुष से काफी देर तक वाद-विवाद करता रहा। उन्होंने मेरे हठधर्मिता पर मुझे शाप दे दिया। माफी मांगने पर उन्होंने कहा कि कलयुग में गुरु नानक जी का आगमन होगा, उनकी कृपा दृष्टि से ही तेरा उद्धार होगा। गुरुनानक देव ने उपदेश देते हुए कहा कि कर्म कांड और बाह्य आडंबर में लोग लिप्त हैं, लेकिन इनसे मोक्ष की प्राप्ति तब तक नहीं हो सकती जब तक कि निश्चय के साथ परम पिता का स्मरण न किया जाए। गुरुजी के अलौकिक वचनों को सुन सभी के शीश श्रद्धापूर्वक गुरु चरणों में झुक गए, वहीं पंडित चतुरदास का मन भी निर्मल हो गया। इस पर पंडित गोपाल शास्त्री ने कहा कि गुरु महाराज आपके चरण पडऩे से मेरा ये बाग पवित्र हो गया है। इसलिए अब ये बाग आपके चरणों में समर्पित है। उसी दिन से यह बाग 'गुरुबाग' के नाम से प्रसिद्ध हो गया।








