Wednesday, May 25, 2022

वाराणसी का जन्म

 24 मई 1956 के दिन 'वाराणसी' का हुआ था जन्म

प्रचीन से भी प्रचीन शहर के नाम से विख्यात बाबा भोलेनाथ की नगरी काशी के नए नाम वाराणसी का जन्म 24 मई 1956 तारिख में हुआ था। 24 मई 1956 के ही दिन वाराणसी नाम अस्तित्व में आया था। पौराणिक नगरी काशी का दूसरा नाम बनारस है तो तीसरा प्रचलित नाम वाराणसी। इसका वर्तमान स्वरूप भले ही प्राचीनता संग कुछ आधुनिकता लिए हो मगर पुरानी कथाएं इसकी भव्यता की कहानी स्वयं कहती हैं।

बता दें कि काशी और बनारस आदि नामों के बीच 24 मई, 1956 को प्रशासनिक तौर पर इसका वाराणसी नाम स्वीकार किया गया। इस दिन भारतीय पंचांग में दर्ज तिथि के अनुसार वैसाख पूर्णिमा, बुद्ध पूर्णिमा और चंद्रग्रहण का योग था। माना जा सकता है कि वाराणसी का नामकरण सबसे पुण्यकाल में स्वीकार किया गया था।

बता दें कि वाराणसी नाम बेहद पुराना है। इतना पुराना कि मत्स्य पुराण में भी इसका जिक्र है। वाराणसी गजेटियर, जो कि 1965 में प्रकाशित किया गया था, उसके दसवें पृष्ठ पर जिले का प्रशासनिक नाम वाराणसी किए जाने की तिथि अंकित है।

इसके साथ ही गजेटियर में इसके वैभव संग विविध गतिविधियां भी इसका हिस्सा हैं। गजेटियर में इसके काशी, बनारस और बेनारस आदि नामों के भी प्राचीनकाल से प्रचलन के तथ्य व प्रमाण हैं, लेकिन आजादी के बाद प्रशासनिक तौर पर 'वाराणसी' नाम की स्वीकार्यता राज्य सरकार की संस्तुति से इसी दिन की गई थी।

वाराणसी की संस्तुति जब शासन स्तर पर हुई तब डा. संपूर्णानंद मुख्यमंत्री थे। स्वयं डा. संपूर्णानंद की पृष्ठभूमि वाराणसी से थी और वो यहां काशी विद्यापीठ में अध्यापन से भी जुड़े रहे थे।

एक मत के अनुसार अथर्ववेद में वरणावती नदी का जिक्र आया है, जो आधुनिक काल में वरुणा का पर्याय माना जाता है। वहीं,अस्सी नदी को पुराणों में असिसंभेद तीर्थ कहा गया है। अग्निपुराण में असि नदी को नासी का भी नाम दिया गया है।

पद्यपुराण में भी दक्षिण-उत्तर में वरुणा और अस्सी नदी का जिक्र है। मत्स्यपुराण में वाराणसी का वर्णन करते हुए कहा गया है कि वाराणस्यां नदी पु सिद्धगन्धर्वसेविता। प्रविष्टा त्रिपथा गंगा तस्मिन्‌ क्षेत्रे मम प्रिये। इसके अतिरिक्त भी विविध धर्म ग्रंथों में वाराणसी, काशी और बनारस सहित यहां के पुराने नामों के दस्तावेज मौजूद हैं।

सन 1965 में इलाहाबाद के सरकारी प्रेस से प्रकाशित गजेटियर में कुल 580 पन्ने हैं। यह आइएएस अधिकारी श्रीमती ईशा बसंती जोशी के संपादकीय नेतृत्व में प्रकाशित किया गया था। सरकार द्वारा दस्तावेजों को डिजिटल करने के तहत सन 2015 में इसे आनलाइन किया गया।

जबकि इसके शोध और प्रकाशन के लिए उस समय 6000 रुपए सरकार की ओर से प्रति गजेटियर रकम उपलब्ध कराई गई थी। वाराणसी गजेटियर में लगभग 20 अलग अलग विषय शामिल हैं।...






Wednesday, July 28, 2021

रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर

 रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर जापान और भारत के आपसी सहयोग का प्रतीक है. 2015 में जब जापान के पीएम शिंजो अबे पीएम मोदी के साथ उनके संसदीय क्षेत्र वाराणसी आए थे, तभी इस कन्वेंशन सेंटर की नींव डाली गई.

क्या है खासियत

  1. 2.87 हेक्टेयर जमीन पर फैले इस कन्वेंशन सेंटर की छत शिवलिंग के आकार की है और इसमें एल्युमिनियम के 108 रुद्राक्ष लगाए गए हैं। इसमें एकसाथ 1,200 लोग बैठ सकते हैं।
  2. सेंटर को भारत तथा जापान की संस्कृति को ध्यान में रखकर बनाया गया है जिसमें फूल, बांस, कंकड़ चीनी मिट्टी के बर्तन, भूसे से सजावट की गई है।  हाल को लोगों की संख्या के अनुरूप दो हिस्सों में बांटने की व्यवस्था है।
  3. पूर्णत: वातूनुकुलित सेंटर में बड़े हाल के अलावा 150 लोगों की क्षमता का एक मीटिंग हाल है। इसके अतिरिक्त यहां एक वीआइपी कक्ष, चार ग्रीन रूम भी हैं।  पार्किंग सुविधा संग सीसीटीवी कैमरे हैं। सौर ऊर्जा की भी व्यवस्था की गई है।
  4. रुद्राक्ष में छोटा जैपनीज गार्डन बनाया गया है। 110 किलोवाट की ऊर्जा के लिए सोलर प्लांट लगा है। वीआईपी रूप और उनके आने-जाने का रास्ता भी अलग से है।
  5. रुद्राक्ष को वातानुकूलित रखने के लिए इटली के उपकरण लगे है। दीवारों पर लगे ईंट भी ताप को रोकते और कॉन्क्रीट के साथ फ्लाई ऐश का भी इस्तेमाल किया गया है।



Rudraksh International Convention Centre

 Prime Minister Narendra Modi has inaugurated the International Cooperation and Convention Centre “Rudraksh”, in Varanasi, Uttar Pradesh. The centre will become an attractive destination for conferences and pull in tourists and businesspersons to the city. The international cooperation and convention centre has been named “Rudraksh” and has as many as 108 Rudraksha at the centre. Its roof is shaped like a ‘Shiva Linga’.

The objective is to provide opportunities for social and cultural interactions between people at the international convention centre. The convention centre has been built with the assistance from Japan International Cooperation Agency. An environment-friendly building, the centre is equipped with adequate security and safety systems. It features a regular entrance, a service entrance and a separate VIP entrance, making it an ideal destination for holding all types of international events.



Wednesday, November 11, 2020

गुरुबाग गुरुद्वारा , गुरुबाग

 ऐक ॐकार सतनाम ..... 

 गुरुद्वारा गुरुबाग गुरुनानक देव महाराज की चरण स्पर्श भूमि है। 

गुरुनानक देव जी की यात्रा के बारे में बताते हुए गुरुद्वारा गुरुबाग के प्रमुख ग्रंथी श्री सुखदेव सिंह जी ने कहा कि फरवरी 1507 में शिवरात्रि के अवसर पर गुरु नानक देव वाराणसी की यात्रा पर आए थे। वर्तमान गुरुद्वारे के स्थान पर उस समय यहां सुंदर बाग था। इसी स्थान पर गुरु नानक देव शबद-कीर्तन कर रहे थे, जिससे प्रभावित होकर बाग के मालिक पंडित गोपाल शास्त्री उनके शिष्य बन गए और अपना बाग उन्हें अर्पित कर दिया। तभी से यहां का नाम सुंदर बाग की जगह गुरुबाग हो गया।

चतुरदास का भी मन निर्मल किया था

गुरुनानक देव जी की यहां यात्रा के दौरान कई विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित करने वाले पंडित चतुरदास ईष्र्यावश उनके पास पहुंचे। इस पर गुरुनानक ने मुस्कुराते हुए स्वयं कहा कि पंडित चतुरदास जी यदि आप को मुझसे कुछ प्रश्न करने हैं तो इस बाग के भीतर एक कुत्ता है, आप उसे यहां लाइए, वही आपके प्रश्नों का उत्तर देगा। हम इस वाद-विवाद के झमेले में पड़ना नहीं चाहते। गुरुजी का इशारा पाकर पंडित जी कुछ ही दूर गए थे कि उन्हें कुत्ता मिला, जिसे वे लेकर आए। गुरु नानक देव ने जब उस पर दृष्टि डाली तो कुत्ते के स्थान पर सुंदर स्वरूप धोती, जनेऊ, तिलक, माला आदि धारण किए एक विद्वान बैठा नजर आया। लोगों के पूछने पर उसने बताया कि मैं भी एक समय विद्वान था, लेकिन मेरे भीतर ईष्या व अहंकार भरा हुआ था। काशी में आने वाले सभी साधु, संत, महात्मा, जोगी, सन्यासी को अपने शास्त्रार्थ से निरुत्तर कर यहां से भगा देता था। एक बार एक महापुरुष से काफी देर तक वाद-विवाद करता रहा। उन्होंने मेरे हठधर्मिता पर मुझे शाप दे दिया। माफी मांगने पर उन्होंने कहा कि कलयुग में गुरु नानक जी का आगमन होगा, उनकी कृपा दृष्टि से ही तेरा उद्धार होगा। गुरुनानक देव ने उपदेश देते हुए कहा कि कर्म कांड और बाह्य आडंबर में लोग लिप्त हैं, लेकिन इनसे मोक्ष की प्राप्ति तब तक नहीं हो सकती जब तक कि निश्चय के साथ परम पिता का स्मरण न किया जाए। गुरुजी के अलौकिक वचनों को सुन सभी के शीश श्रद्धापूर्वक गुरु चरणों में झुक गए, वहीं पंडित चतुरदास का मन भी निर्मल हो गया। इस पर पंडित गोपाल शास्त्री ने कहा कि गुरु महाराज आपके चरण पडऩे से मेरा ये बाग पवित्र हो गया है। इसलिए अब ये बाग आपके चरणों में समर्पित है। उसी दिन से यह बाग 'गुरुबाग' के नाम से प्रसिद्ध हो गया।



Tuesday, August 4, 2020

श्री भीमेश्वर ज्योतिर्लिंग

श्री भीमेश्वर ज्योतिर्लिंग (काशी करवत) नेपाली खपड़ा, गोविन्दपुरा, चौक में स्थित है। 
श्री भीमेश्वर महादेव को भीमाशंकर भी कहते हैं। इस ज्योतिर्लिंग की उद्भव के विषय में शिवपुराण में यह कथा वर्णित है - प्राचीनकाल में भीम नामक एक महाप्रतापी राक्षस था। वह कामरूप प्रदेश में अपनी माँ के साथ रहता था। वह महाबली राक्षस, राक्षसराज रावण के छोटे भाई कुंभकर्ण का पुत्र था।
जब वह युवावस्था को प्राप्त हुआ तब उसकी माता ने उसे सारी बातें बताईं। भगवान्‌ विष्णु के अवतार श्रीरामचंद्रजी द्वारा अपने पिता के वध की बात सुनकर वह महाबली राक्षस अत्यंत क्रुद्ध हो उठा। अब वह निरंतर भगवान्‌ श्री हरि के वध का उपाय सोचने लगा।
उसने अपने अभीष्ट की प्राप्ति के लिए एक हजार वर्ष तक कठिन तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उसे लोक विजयी होने का वर दे दिया। अब तो वह राक्षस ब्रह्माजी के उस वर के प्रभाव से समस्त जगत को पीड़ित करने लगा। उसने देवलोक पर आक्रमण करके इंद्र आदि सारे देवताओं को वहाँ से बाहर निकाल दिया।
पूरे देवलोक पर अब भीम का अधिकार हो गया। इसके बाद उसने भगवान्‌ श्रीहरि को भी युद्ध में परास्त किया। श्रीहरि को पराजित करने के पश्चात उसने कामरूप के परम शिवभक्त राजा सुदक्षिण पर आक्रमण करके उन्हें मंत्रियों-अनुचरों सहित बंदी बना लिया। इस प्रकार धीरे-धीरे उसने सारे लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया। उसके अत्याचार से वेदों, पुराणों, शास्त्रों और स्मृतियों का सर्वत्र एकदम लोप हो गया। वह किसी को कोई भी धार्मिक कृत्य नहीं करने देता था। इस प्रकार यज्ञ, दान, तप, स्वाध्याय आदि के सारे काम एकदम रूक गए।
भीम के अत्याचार की भीषणता से घबराकर ऋषि-मुनि और देवगण भगवान्‌ शिव की शरण में गए और उनसे अपना तथा अन्य सारे प्राणियों का दुःख कहा। उनकी यह प्रार्थना सुनकर भगवान शिव ने कहा, 'मैं शीघ्र ही उस अत्याचारी राक्षस का संहार करूँगा। उसने मेरे प्रिय भक्त, कामरूप-नरेश सुदक्षिण को भी सेवकों सहित बंदी बना लिया है। वह अत्याचारी असुर अब और अधिक जीवित रहने का अधिकारी नहीं रह गया।' भगवान्‌ शिव से यह आश्वासन पाकर ऋषि-मुनि और देवगण अपने-अपने स्थान को वापस लौट गए।
इधर राक्षस भीम के बंदीगृह में पड़े हुए राजा सदक्षिण ने भगवान्‌ शिव का ध्यान किया। वे अपने सामने पार्थिव शिवलिंग रखकर अर्चना कर रहे थे। उन्हें ऐसा करते देख क्रोधोन्मत्त होकर राक्षस भीम ने अपनी तलवार से उस पार्थिव शिवलिंग पर प्रहार किया। किंतु उसकी तलवार का स्पर्श उस लिंग से हो भी नहीं पाया कि उसके भीतर से साक्षात्‌ शंकरजी वहाँ प्रकट हो गए। उन्होंने अपनी हुँकारमात्र से उस राक्षस को वहीं जलाकर भस्म कर दिया।
भगवान्‌ शिवजी का यह अद्भुत कृत्य देखकर सारे ऋषि-मुनि और देवगण वहाँ एक होकर उनकी स्तुति करने लगे। उन लोगों ने भगवान्‌ शिव से प्रार्थना की कि महादेव! आप लोक-कल्याणार्थ अब सदा के लिए यहीं निवास करें।वहाँ वह ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा के लिए निवास करने लगे। उनका यह ज्योतिर्लिंग भीमेश्वर के नाम से विख्यात हुआ।
इस ज्योतिर्लिंग की महिमा अमोघ है। इसके दर्शन का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता। भक्तों की सभी मनोकामनाएँ यहाँ आकर पूर्ण हो जाती हैं।


Sunday, July 26, 2020

करकोटक नागतीर्थ

पाताल शिव
शाश्वत धर्मनगरी काशी (वाराणसी) में धार्मिक रहस्यों की कमी नहीं है! यहां के नवापुरा नामक एक स्थान पर एक कुआं है, जिसके बारे में लोगों की मान्‍यता है कि इसकी अथाह गहराई पाताल और नागलोक तक जाती है।
प्रचलित रूप में इसे  करकोटक नागतीर्थ के नाम से जाना जाता है। यहां के लोग बताते हैं कि यहां स्थित कूप (कुएं) की गहराई कितनी है, इस बात की जानकारी किसी को भी नहीं।
महर्षि पतंजलि ने अपने तप से इस कुंड का निर्माण कराया था। इसी स्‍थान पर महर्षि पतंजलि ने पतंजलिसूत्र और व्याकरणाचार्य पाणिनी ने महाभाष्य की रचना की थी।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शिव नगरी काशी से ही नागलोक जाने का रास्ता है। नागकुंड के अंदर ही एक कुआं है जहां से नागलोक जाने का रास्ता है। कुआं के अंदर प्राचीन शिवलिंग भी स्थापित है जो साल भर पानी में डूबा रहता है और नागपंचमी के पहले कुंड का पानी निकाल कर शिवलिंग का श्रृंगार किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं की माने तो यहां पर आज भी नाग निवास करते हैं।
कालसर्प योग से मुक्ति के लिए बेहद खास है नागकुंड, देश में तीन ही ऐसे कुंड हैं जहां पर दर्शन करने से कालसर्प योग से मुक्ति मिलती है। जैतपुरा का कुंड ही मुख्य नागकुंड है।
 नागपंचमी के पहले कुंड का जल निकाल कर सफाई की जाती है फिर शिवलिंग की पूजा की जाती है इसके बाद नागकुंड फिर से पानी से भर जाता है।
आज के दिन नागकुंड में दर्शन करने वालों की सुबह से ही कतार लग जाती है।
यहां पर दूर-दराज से लोग दर्शन करने आते हैं।
नागकुंड का दर्शन करने से ही कालसर्प योग से मुक्ति मिलती है इसके अतिरिक्त जीवन में आने वाली सारी बाधाएं खत्म हो जाती है।
बनारस में नागकुंड का विशेष स्थान है जिस नगरी में स्वयं महादेव विराजमन रहते हैं वहां का नागकुंड अनोखा फल देने वाला होता है।