Thursday, April 7, 2016

विक्रम संवत

विक्रम संवत अत्यन्त प्राचीन संवत है। साथ ही ये गणित की दृष्टि से अत्यन्त सुगम और सर्वथा ठीक हिसाब रखकर निश्चित किये गये है। किसी नवीन 'संवत' को चलाने की शास्त्रीय विधि यह है कि जिस नरेश को अपना संवत चलाना हो, उसे संवत चलाने के दिन से पूर्व कम-से-कम अपने पूरे राज्य में जितने भी लोग किसी के ऋणी हों, उनका ऋण अपनी ओर से चुका देना चाहिये। 'विक्रम संवत' का प्रणेता सम्राट विक्रमादित्य को माना जाता है। कालिदास इस महाराजा के एक रत्न माने जाते हैं। कहना नहीं होगा कि भारत के बाहर इस नियम का कहीं पालन नहीं हुआ। भारत में भी महापुरुषों के संवत उनके अनुयायियों ने श्रद्धावश ही चलाये; लेकिन भारत का सर्वमान्य संवत 'विक्रम संवत' ही है और महाराज विक्रमादित्य ने देश के सम्पूर्ण ऋण को, चाहे वह जिस व्यक्ति का रहा हो, स्वयं देकर इसे चलाया। इस संवत के महीनों के नाम विदेशी संवतों की भाँति देवता, मनुष्य या संख्यावाचक कृत्रिम नाम नहीं हैं। यही बात तिथि तथा अंश (दिनांक) के सम्बन्ध में भी है, वे भी सूर्य-चन्द्र की गति पर आश्रित हैं। सारांश यह कि यह संवत अपने अंग-उपांगों के साथ पूर्णत: वैज्ञानिक सत्य पर स्थित है।
शास्त्रों व शिलालेखों में उल्लेख 
'विक्रम संवत' के उद्भव एवं प्रयोग के विषय में कुछ कहना कठिन है। यही बात 'शक संवत' के विषय में भी है। किसी विक्रमादित्य राजा के विषय में, जो ई. पू. 57 में था, सन्देह प्रकट किए गए हैं। इस संवत का आरम्भ गुजरात में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से (नवम्बर, ई. पू. 58) और उत्तरी भारत में चैत्र कृष्ण प्रतिपदा (अप्रैल, ई. पू. 58) से माना जाता है। बीता हुआ विक्रम वर्ष ईस्वी सन+57 के बराबर है। कुछ आरम्भिक शिलालेखों में ये वर्ष कृत के नाम से आये हैं[1]। विद्वान मतभेद विक्रम संवत के प्रारम्भ के विषय में भी विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ लोग ईसवी सन 78 और कुछ लोग ईसवी सन 544 में इसका प्रारम्भ मानते हैं। फ़ारसी ग्रंथ 'कलितौ दिमनः' में पंचतंत्र का एक पद्य 'शशिदिवाकर योर्ग्रहपीडनम्श' का भाव उद्धृत है। विद्वानों ने सामान्यतः 'कृत संवत' को 'विक्रम संवत' का पूर्ववर्ती माना है। किन्तु 'कृत' शब्द के प्रयोग की व्याख्या सन्तोषजनक नहीं की जा सकी है। कुछ शिलालेखों में मावल-गण का संवत उल्लिखित है, जैसे- नरवर्मा का मन्दसौर शिलालेख। 'कृत' एवं 'मालव' संवत एक ही कहे गए हैं, क्योंकि दोनों पूर्वी राजस्थान एवं पश्चिमी मालवा में प्रयोग में लाये गये हैं। कृत के 282 एवं 295 वर्ष तो मिलते हैं, किन्तु मालव संवत के इतने प्राचीन शिलालेख नहीं मिलते। यह भी सम्भव है कि कृत नाम पुराना है और जब मालवों ने उसे अपना लिया तो वह 'मालव-गणाम्नात' या 'मालव-गण-स्थिति' के नाम से पुकारा जाने लगा। किन्तु यह कहा जा सकता है कि यदि कृत एवं मालव दोनों बाद में आने वाले विक्रम संवत की ओर ही संकेत करते हैं, तो दोनों एक साथ ही लगभग एक सौ वर्षों तक प्रयोग में आते रहे, क्योंकि हमें 480 कृत वर्ष एवं 461 मालव वर्ष प्राप्त होते हैं। यह मानना कठिन है कि कृत संवत का प्रयोग कृतयुग के आरम्भ से हुआ। यह सम्भव है कि 'कृत' का वही अर्थ है जो 'सिद्ध' का है, जैसे- 'कृतान्त' का अर्थ है 'सिद्धान्त' और यह संकेत करता है कि यह कुछ लोगों की सहमति से प्रतिष्ठापित हुआ है। 8वीं एवं 9वीं शती से विक्रम संवत का नाम विशिष्ट रूप से मिलता है। संस्कृत के ज्योति:शास्त्रीय ग्रंथों में यह शक संवत से भिन्नता प्रदर्शित करने के लिए यह सामान्यतः केवल संवत नाम से प्रयोग किया गया है। 'चालुक्य विक्रमादित्य षष्ठ' के 'वेडरावे शिलालेख' से पता चलता है कि राजा ने शक संवत के स्थान पर 'चालुक्य विक्रम संवत' चलाया, जिसका प्रथम वर्ष था - 1076-77 ई.।
नव संवत्सर 'विक्रम संवत 2073' का शुभारम्भ 8 अप्रैल, सन 2016 को चैत्र मास के शुक्ल पक्ष, प्रतिपदा से है। पुराणों के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ब्रह्मा ने सृष्टि निर्माण किया था, इसलिए इस पावन तिथि को नव संवत्सर पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। संवत्सर-चक्र के अनुसार सूर्य इस ऋतु में अपने राशि-चक्र की प्रथम राशि मेष में प्रवेश करता है। भारतवर्ष में वसंत ऋतु के अवसर पर नूतन वर्ष का आरम्भ मानना इसलिए भी हर्षोल्लासपूर्ण है, क्योंकि इस ऋतु में चारों ओर हरियाली रहती है तथा नवीन पत्र-पुष्पों द्वारा प्रकृति का नव शृंगार किया जाता है। लोग नववर्ष का स्वागत करने के लिए अपने घर-द्वार सजाते हैं तथा नवीन वस्त्राभूषण धारण करके ज्योतिषाचार्य द्वारा नूतन वर्ष का संवत्सर फल सुनते हैं। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि के दिन प्रात: काल स्नान आदि के द्वारा शुद्ध होकर हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प और जल लेकर ओम भूर्भुव: स्व: संवत्सर- अधिपति आवाहयामि पूजयामि च इस मंत्र से नव संवत्सर की पूजा करनी चाहिए तथा नववर्ष के अशुभ फलों के निवारण हेतु ब्रह्मा जी से प्रार्थना करनी चाहिए कि 'हे भगवन! आपकी कृपा से मेरा यह वर्ष कल्याणकारी हो और इस संवत्सर के मध्य में आने वाले सभी अनिष्ट और विघ्न शांत हो जाएं।' नव संवत्सर के दिन नीम के कोमल पत्तों और ऋतुकाल के पुष्पों का चूर्ण बनाकर उसमें काली मिर्च, नमक, हींग, जीरा, मिश्री, इमली और अजवायन मिलाकर खाने से रक्त विकार आदि शारीरिक रोग शांत रहते हैं और पूरे वर्ष स्वास्थ्य ठीक रहता है।
राष्ट्रीय संवत
भारतवर्ष में इस समय देशी विदेशी मूल के अनेक संवतों का प्रचलन है, किंतु भारत के सांस्कृतिक इतिहास की दृष्टि से सर्वाधिक लोकप्रिय राष्ट्रीय संवत यदि कोई है तो वह 'विक्रम संवत' ही है। आज से लगभग 2,068 वर्ष यानी 57 ईसा पूर्व में भारतवर्ष के प्रतापी राजा विक्रमादित्य ने देशवासियों को शकों के अत्याचारी शासन से मुक्त किया था। उसी विजय की स्मृति में चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से विक्रम संवत का भी आरम्भ हुआ था। नये संवत की शुरुआत प्राचीन काल में नया संवत चलाने से पहले विजयी राजा को अपने राज्य में रहने वाले सभी लोगों को ऋण-मुक्त करना आवश्यक होता था। राजा विक्रमादित्य ने भी इसी परम्परा का पालन करते हुए अपने राज्य में रहने वाले सभी नागरिकों का राज्यकोष से कर्ज़ चुकाया और उसके बाद चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से मालवगण के नाम से नया संवत चलाया। भारतीय कालगणना के अनुसार वसंत ऋतु और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि अति प्राचीन काल से सृष्टि प्रक्रिया की भी पुण्य तिथि रही है। वसंत ऋतु में आने वाले वासंतिक 'नवरात्र' का प्रारम्भ भी सदा इसी पुण्य तिथि से होता है। विक्रमादित्य ने भारत की इन तमाम कालगणनापरक सांस्कृतिक परम्पराओं को ध्यान में रखते हुए ही चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि से ही अपने नवसंवत्सर संवत को चलाने की परम्परा शुरू की थी और तभी से समूचा भारत इस पुण्य तिथि का प्रतिवर्ष अभिवंदन करता है। दरअसल, भारतीय परम्परा में चक्रवर्ती राजा विक्रमादित्य शौर्य, पराक्रम तथा प्रजाहितैषी कार्यों के लिए प्रसिद्ध माने जाते हैं। उन्होंने 95 शक राजाओं को पराजित करके भारत को विदेशी राजाओं की दासता से मुक्त किया था। राजा विक्रमादित्य के पास एक ऐसी शक्तिशाली विशाल सेना थी, जिससे विदेशी आक्रमणकारी सदा भयभीत रहते थे। ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, कला संस्कृति को विक्रमादित्य ने विशेष प्रोत्साहन दिया था। धंवंतरि जैसे महान वैद्य, वराहमिहिर जैसे महान ज्योतिषी और कालिदास जैसे महान साहित्यकार विक्रमादित्य की राज्यसभा के नवरत्नों में शोभा पाते थे। प्रजावत्सल नीतियों के फलस्वरूप ही विक्रमादित्य ने अपने राज्यकोष से धन देकर दीन दु:खियों को साहूकारों के कर्ज़ से मुक्त किया था। एक चक्रवर्ती सम्राट होने के बाद भी विक्रमादित्य राजसी ऐश्वर्य भोग को त्यागकर भूमि पर शयन करते थे। वे अपने सुख के लिए राज्यकोष से धन नहीं लेते थे। राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान पिछले दो हज़ार वर्षों में अनेक देशी और विदेशी राजाओं ने अपनी साम्राज्यवादी आकांक्षाओं की तुष्टि करने तथा इस देश को राजनीतिक द्दष्टि से पराधीन बनाने के प्रयोजन से अनेक संवतों को चलाया किंतु भारत राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान केवल विक्रमी संवत के साथ ही जुड़ी रही। अंग्रेज़ी शिक्षा-दीक्षा और पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव के कारण आज भले ही सर्वत्र ईस्वी संवत का बोलबाला हो और भारतीय तिथि-मासों की काल गणना से लोग अनभिज्ञ होते जा रहे हों परंतु वास्तविकता यह भी है कि देश के सांस्कृतिक पर्व-उत्सव तथा राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, गुरु नानक आदि महापुरुषों की जयंतियाँ आज भी भारतीय काल गणना के हिसाब से ही मनाई जाती हैं, ईस्वी संवत के अनुसार नहीं। विवाह-मुण्डन का शुभ मुहूर्त हो या श्राद्ध-तर्पण आदि सामाजिक कार्यों का अनुष्ठान, ये सब भारतीय पंचांग पद्धति के अनुसार ही किया जाता है, ईस्वी सन् की तिथियों के अनुसार नहीं।



साभार bhartdiscovery.org

Wednesday, April 6, 2016

वासंतिक नवरात्र इस बार आठ दिन के ही होंगे

शक्ति की अधिष्ठात्री भगवती की आराधना, उपासना का पर्व वासंतिक नवरात्र इस बार आठ दिनों के होंगे.
आगामी आठ अप्रैल से शुरू होकर 15 अप्रैल को रामनवमी पर हवन के साथ संपन्न होंगे. व्रत का पारन 16 अप्रैल को किया जाएगा.
ज्योतिषाचार्य अनुसार, इस बार पंचम तिथि की हानि होने से नवरात्र आठ दिनों के ही हैं. प्रतिपदा सात अप्रैल की शाम 4:52 बजे लग रही है जो आठ अप्रैल की दोपहर 2:26 बजे तक रहेगी. ऐसे में घटस्थापना और प्रथम गौरी दर्शन इसी दिन (आठ अप्रैल) होगा। दुर्गा अष्टमी व्रत 14 अप्रैल को रखा जाएगा.
रामनवमी 15 अप्रैल को मनाई जाएगी और नवरात्र का हवन भी इसी दिन किया जाएगा.
माता का आगमन शुक्रवार को डोली, तो गमन शनिवार को मुर्गा पर हो रहा है.
वैध्रति योग के कारण घट स्थापना का शुभ मुहूर्त दोपहर 11:53 बजे से 12:25 बजे तक अभिजीत नक्षत्र में है.
पूजन विधान :
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को प्रात: स्नानादि नित्य कर्म से निवृत होकर गंध, जल, अक्षत, पुष्प लेकर संकल्प करना चाहिए. सर्वप्रथम ब्रह्म का आह्वान कर आसन, पाद्य, अघ्र्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गंध, अक्षत, पुष्प, धूप-दीप नैवेद्य, आचमन, तांबूल, निराजन, नमस्कार, पुष्पांजलि व प्रार्थना आदि उपचारों से पूजन करना चाहिए. घट स्थापनोपरांत तैलभ्यंग स्नान तथा नवरात्र व्रत का संकल्प कर गणपति व मातृका पूजन करना चाहिए.
 वर्ष में पड़ने वाले दो नवरात्रों में शारदीय नवरात्र नौ दुर्गा व वासंतिक नौ गौरी को समर्पित हैं. दोनों में ही व्रत, पूजन व दर्शन का विधान है.
 वासंतिक नवरात्र का प्रारंभ हिन्दू नववर्ष के प्रथम दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है. अत: इसे चैत्रीय नवरात्र भी कहा जाता है.


वासंतिक नवरात्र

वासंतिक नवरात्र में माँ दुर्गा के नौ रूप इस प्रकार हैं।
1– मुख निर्मालिका गौरी– वासंतिक नवरात्र के पहले दिन (प्रथमा) को मुखनिर्मालिका गौरी का दर्शन-पूजन किया जाता है। इनका मंदिर गाय घाट क्षेत्र में स्थित है। मान्यता है कि इनके दर्शन से वर्ष भर मंगल और कल्याण होता है।
2- ज्येष्ठा गौरी– वासंतिक नवरात्र के दूसरे दिन (द्वितीया) को ज्येष्ठा गौरी का भक्त दर्शन-पूजन करते हैं। इनका भव्य मंदिर कर्णघण्टा (सप्त सागर) क्षेत्र में स्थित है। इनके दर्शन से भक्तों का सर्व मंगल होता है।
3– सौभाग्य गौरी– वासंतिक नवरात्र के तीसरे दिन (तृतीया) को माँ दुर्गा के सौभाग्य गौरी रूप का दर्शन पूजन होता है। इनका मंदिर ज्ञानवापी परिसर के सत्यनारायण मंदिर में स्थित है। शास्त्रों में माँ के इस रूप के दर्शन-पूजन का विशेष महत्व दिया गया है। गृहस्थ आश्रम में महिलाओं के सुख-सौभाग्य की अधिष्ठात्री गौरी हैं। महिलाए माँ से पति के कल्याण की कामना करती हैं।
4– श्रृंगार गौरी– वासंतिक नवरात्र के चौथे दिन (चतुर्थी) को माँ श्रृंगार गौरी का पूजन अर्चन होता है। इनका मंदिर ज्ञानवापी परिसर में मस्जिद के पीछे हैं। मान्यता है कि इनके दर्शन से महिलाओं का श्रृंगार वर्ष भर बना रहता है।
5– विशालाक्षी गौरी– वासंतिक नवरात्र के पांचवे दिन (पंचमी) को भक्त माँ विशालाक्षी गौरी की पूजा करते हैं। इनका मंदिर मीर घाट के धर्मकूप क्षेत्र में स्थित है। इनकी आराधना करने से सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। माँ स्त्रियों को संतान प्रदान करती हैं।
 6– ललिता गौरी– वासंतिक नवरात्र के छठें दिन (षष्ठी) को ललिता गौरी की पूजा की जाती है। इनका मंदिर ललिता घाट में स्थित है। भक्त ललिता घाट पर स्नान करके माँ का दर्शन-पूजन करते हैं। मान्यता है कि इनके दर्शन से सभी प्रकार का कल्याण होता है। साथ ही सुख शांति की प्राप्ति होती है।
7– भवानी गौरी– वासंतिक नवरात्र के सातवें दिन (सप्तमी) को भवानी गौरी के दर्शन-पूजन का विधान है। माँ का मंदिर विश्वनाथ गली में स्थित माता अन्नपूर्णा मंदिर के निकट राम मंदिर में है। माँ सभी बाधा व आपदाओं को हरने वाली है।
8– मंगला गौरी – वासंतिक नवरात्र के आठवें दिन (अष्टमी) को माँ मंगलागौरी का दर्शन-पूजन होता है। इनका मंदिर बाला घाट स्थित बाला जी मंदिर के पास है। माँ भक्तों का हमेशा कल्याण करती हैं। इनके दर्शन-पूजन से कन्या विवाह की बाधाएँ दूर हो जाती हैं।
9– महालक्ष्मी गौरी– वासंतिक नवरात्र के नौवें दिन (नवमी) को महालक्ष्मी गौरी का दर्शन-पूजन होता है। इनका मंदिर लक्ष्मी कुण्ड का सुप्रसिद्ध लक्ष्मी मंदिर है। मान्यता है कि भूतों में देवी लक्ष्मी रूप में है। गृहस्थों के दर्शन-पूजन से धन सम्पत्ति प्राप्त होती है।


Friday, April 1, 2016

महामूर्ख सम्मेलन

धर्म नगरी काशी में बुधवार को डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद घाट पर मूर्ख दिवस के उपलक्ष्य में महामूर्ख सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमें देश के कोने—कोने से आए हास्य व्यंग कवियों ने अपनी प्रस्तुति के माध्यम से देश की वर्तमान स्थिति पर आईना दिखाया।









 


Sunday, March 27, 2016

बुढ़वा मंगल

बुढ़वा मंगल भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक होली से जुड़ा है, जो उत्तर प्रदेश के बनारस में मुख्य रूप से मनाया जाता है। वैसे तो देश में प्रत्येक स्थान पर होली अलग-अलग तरह से मनाई जाती है, किंतु वाराणसी (आधुनिक बनारस) में इसे मनाने का अपना एक निराला ही अन्दाज़ है। यहाँ यह पर्व होली के बाद पड़ने वाले मंगलवार तक मनाया जाता है, जिसे यहाँ के लोग 'बुढ़वा मंगल' या 'वृद्ध अंगारक' पर्व भी कहते हैं।
नवान्नेष्टि यज्ञ माघ मास की पूर्णिमा पर प्राय: "होली का डांडा" रोप दिया जाता है और इसी दिन से लोग इसके समीप लकड़ियाँ और गाय के गोबर से कण्डे इकट्ठा करने लगते हैं। लकड़ियों को इकट्ठा करने का यह काम फाल्गुन की पूर्णिमा तक चलता है। इसके बाद उसमें आग लगाई जाती है। यह भी एक प्रकार का यज्ञ है। इसे नवान्नेष्टि यज्ञ कहा जाता है। एक महत्त्वपूर्ण कथन यह भी है कि इस दिन खेत से उपजे नये अन्न को लेकर इस यज्ञ में आहुति दी जाती है और उसके बाद प्रसाद वितरण किया जाता है।[1] यहाँ होलिका के पूजन के समय निम्न मंत्र का उच्चरण किया जाता है- असृक्याभयसंत्रस्तै: कृता त्वं होलि बालिशै:। अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव।। परम्परा होलिका के दिन खेत में उगने वाले नये अन्न को लेकर यज्ञ में हवन करने की परंपरा है। इस अन्न को 'होला' कहा जाता है। इसीलिए इस पर्व को भी लोग 'होलिकोत्सव' कहते हैं। बनारस की परंपरा में यह पर्व होली के बाद पड़ने वाले मंगलवार तक मनाया जाता है। इसलिए यह मंगल "बुढ़वा मंगल" के नाम से जाना जाता है। इस मंगल को 'बुढ़वा मंगल' इसलिए भी कहते हैं कि यह वर्ष के आखिरी मंगल के पूर्व का मंगल होता है। मंगल का अभिप्राय मंगल कामना से है, इसलिए वाराणसी में इस उत्सव को मंगलवार को पूर्ण माना जाता है। होली को प्राय: उत्सव समाप्त हो जाता है, परंतु वाराणसी में इसके बाद मिलने-जुलने का पर्व प्रारम्भ होता है। लोग घर-घर जाकर अपने से बड़ों के चरणों में श्रद्धा से अबीर और गुलाल लगाते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं तथा छोटों को आशीर्वाद देते हैं।विभिन्न कार्यक्रम 'बुढ़वा मंगल' पर्व के बाद वाराणसी में नृत्य, संगीत, कवि सम्मेलन एवं महामूर्ख सम्मेलन चलते रहते हैं। लोग बड़े उत्साह से इन सभी सम्मेलनों में जाते हैं। भारत की पवित्र नदियों में से एक गंगा नदी में लोग नौका विहार भी करते हैं और साथ ही गंगाजी की पूजा भी करते हैं। इसी उल्लास के साथ आने वाले नूतन वर्ष की मंगल कामना करते हुए वाराणसी में यह पर्व मंगलवार को होली के बाद समाप्त समझा जाता है। मेले का आयोजन होली के अगले मंगलवार को आयोजित होने वाला 'बुढ़वा मंगल' का मेला बनारसी मस्ती और जिन्दादिली की एक नायाब मिसाल है। ऐसी मान्यता है कि होली, जिसमें मुख्यतः युवाओं का ही प्रभुत्व रहता है, को बुजुर्गों द्वारा अब भी अपने जोश और उत्साह से परिचित कराने का प्रयास है- 'बुढ़वा मंगल' का मेला। बनारस के इस पारम्पिक लोक मेले से हिन्दी साहित्य के शिरोमणि भारतेंदु हरिश्चंद्र का भी जुड़ाव रहा है। बनारस के राजपरिवार ने भी इस परंपरा को अपना समर्थन दिया। मेले के आयोजन को कई उतार-चढाव से भी गुजरना पड़ा, किन्तु आम लोगों की सहभागिता और दबाव ने प्रशासन को भी इस समारोह के आयोजन में तत्परता से जुड़ने को बाध्य किया। गंगा की लहरों पर एक बड़ी नौका पर सांस्कृतिक कार्यक्रम, सर पर बनारसी टोपी सजाए संस्कृति प्रेमी और आस-पास छोटी-बड़ी नौकाओं तथा घाटों पर बैठे सुधि दर्शकगण इस सांस्कृतिक नगरी की पारम्परिकता को एक नया आयाम देते हैं। राजपरिवार द्वारा रामनगर दुर्ग में भी इस कार्यक्रम का विधिवत आयोजन किया जाता है।


साभार bhartdiscovery.org

Monday, March 21, 2016

काशी में आज देर रात जलेगी होलिका, होली कल

काशी में बुधवार और देश के अन्य भागों में रंगोत्सव यानी होली गुरुवार (24 मार्च) को मनाई जाएगी। मंगलवार की देर रात होलिका दहन होगा। ज्योतिषाचार्यों की मानें तो होली आने की सूचना होलाष्टक से प्राप्त होती है। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर होलिका दहन तक के समय को धर्मशास्त्रों ने होलाष्टक नाम दिया है। मंगलवार को रााित्र 10 बजकर 52 मिनट से 12 बजकर नौ मिनट तक होलिका दहन होगा। काशी के कुछ पंचांगों ने होलिका दहन रात्रि तीन बजकर 19 मिनट पर भद्रा के पश्चात होलिका दहन को शास्त्र सम्मत बताया है। श्री गणपति ज्योतिष अनुसंधान केंद्र के पंडित दीपक मालवीय बताते हैं, होलाष्टक 16 मार्च से शुरू हो गया है। होलाष्टक के दौरान शुभ कार्य पूरी तरह से प्रतिबंधित होता है। इसके पीछे धार्मिक के अलावा ज्योतिषीय मान्यता भी है। ज्योतिष के अनुसार अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी का शनि, एकादश की शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुद्ध, चतुर्दशी को मंगल तथा पूर्णिमा को राहु उग्र रूप लिए होते हैं। इससे पूर्णिमा के आठ दिन पूर्व मनुष्य का मस्तिष्क अनेक सुखद व दुखद आशंकाओं से ग्रसित रहता है।  यही वजह है कि होली एक दिन का पर्व न होकर पूरे आठ दिन का त्योहार है।