यह देवी मां का चौथा स्वरूप है। इनका मंदिर दुर्गाकुंड में स्थित है। मान्यता है कि देवी मां ने अपनी हंसी से ब्रह्मांड को उत्पन्न किया था। इस कारण उनका नाम कुष्मांडा देवी हो गया। इन्हें सृष्टि की आदि स्वरूपा माना जाता है। इन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है। इनके सात हाथों में कमंडल, धनुष-बाण, कमल, फूल, अमृतपूर्ण कलश, चक्र और गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। देवी का वाहन सिंह है।
Thursday, October 15, 2015
Wednesday, October 14, 2015
चित्रघण्टा देवी
नवरात्र के तीसरे दिन को देवी के चंद्रघण्टा स्वरूप के दर्शन-पूजन का विधान है। इन्हें चित्रघण्टा देवी भी कहते हैं। इनका मंदिर वाराणसी के ठठेरी बाजार के पास चित्रघंटा गली में स्थित है।
पद्मश्री देवी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार 'चंद्रघण्टयां यस्सा: सा अह्लादकारी' यानी चंद्रमा जिसके घण्टे में स्थित हों, उस देवी का नाम चंद्रघण्टा है। भगवती का बीज मंत्र 'हृीं' है। अर्धचंद्र से अलंकृत जो देवी का बीज है, वह सब मनोरथ पूर्ण करने वाला है। इस प्रकार एकाक्षर ब्रह्म का ऐसे यति ध्यान करते हैं, जिनका मन, हृदय शुद्ध है जो नियति के मान्यपूर्ण और ज्ञान के सागर हैं....
ब्रह्मचारिणी देवी
नवदुर्गा के दर्शन पूजन के क्रम में दूसरे दिन ब्रह्माघाट स्थित आदिशक्ति माँ श्री ब्रह्मचारिणी देवी, ब्रह्माघाट, का भी दर्शन पूजन होता है।
नवरात्री के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना का विधान है. मां ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा का दूसरा स्वरूप हैं तथा भक्तों एवं सिद्धों को अमोघ फल देने वाली माता हैं. देवी ब्रह्मचारिणी की उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है. माँ ब्रह्मचारिणी की कृपा से मनुष्य को सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है, तथा जीवन की अनेक समस्याओं एवं परेशानियों का नाश होता है.
देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप पूर्ण ज्योर्तिमय है. मां दुर्गा की नौ शक्तियों में से द्वितीय शक्ति देवी ब्रह्मचारिणी का है. ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली अर्थात तप का आचरण करने वाली मां ब्रह्मचारिणी. यह देवी शांत और निमग्न होकर तप में लीन रहती हैं. मुख पर कठोर तपस्या के कारण अद्भुत तेज और शांति का ऐसा अनूठा संगम है जो तीनों लोको को उजागर करता है.
देवी ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में अक्ष माला होती है और बायें हाथ में कमण्डल होता है. देवी ब्रह्मचारिणी साक्षात ब्रह्म का स्वरूप हैं अर्थात तपस्या का मूर्तिमान रूप हैं. मां ब्रह्मचारिणी के कई अन्य भी नाम हैं जैसे तपश्चारिणी, अपर्णा और उमा.
पूजा विधि :
सर्वप्रथम जिन देवी-देवताओ एवं गणों व योगिनियों को कलश में आमंत्रित किया है, उन्हें दूध, दही, , घृत, व मधु से स्नान कराऐं तत्पश्चात गणों व योगिनियों की फूल, अक्षत, रोली, चंदन, से पूजा करें व देवी को जो कुछ भी प्रसाद अर्पित कर रहे हैं उसमें से एक अंश इन्हें भी अर्पण करें. प्रसाद के पश्चात आचमन करें और फिर पान, सुपारी भेंट कर इनकी प्रदक्षिणा करें. देवी की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर प्रार्थना करें “दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू, देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा” मां ब्रह्मचारिणी को अरूहूल का फूल (लाल रंग का एक विशेष फूल) व कमल की माला पहनायें. माता ब्रह्माचारिणी को प्रसन्न करने के लिये शक्कर का भोग लगाया जाता है. तत्पश्चात भोले शंकर की पूजा करें व सबसे अंत में ब्रह्मा जी के नाम से जल, फूल, अक्षत, सहित सभी सामग्री हाथ में लेकर “ॐ ब्रह्मणे नम:” कहते हुए सामग्री भूमि पर रखें. तत्पश्चात मां ब्रह्मचारिणी का ध्यान कर दुर्गा सप्तशती का पाठ करें.
“मां ब्रह्मचारिणी का ध्यान”
वन्दे वांछित लाभायचन्द्रार्घकृतशेखराम्।
जपमालाकमण्डलु धराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥
गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम।
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥
परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन।
पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥
पाठ करनें के बाद मां ब्रह्मचारिणी मंत्र, स्तोत्र पाठ, कवच का जाप करें. वे इस प्रकार हैं.
“मंत्र”
या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।
“मां ब्रह्मचारिणी का स्तोत्र पाठ”
तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।
ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणीप्रणमाम्यहम्॥
“मां ब्रह्मचारिणी का कवच”
त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥
पंचदशी कण्ठे पातुमध्यदेशे पातुमहेश्वरी॥
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।
अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।
मंत्र, स्तोत्र पाठ, कवच के जाप के साथ घी व कपूर मिलाकर देवी की आरती करें. अंत में दोनों हाथ जोड़कर सभी देवी देवताओं को प्रणाम करें और क्षमा प्रार्थना करें “आवाहनं न जानामि न जानामि वसर्जनं, पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरी..
तथा शाम के समय में मां दुर्गा की आरती करें व प्रसाद वितरण करें.
मां ब्रह्मचारिणी की प्रतिमा की षोडशोपचार (गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य, इन पाँच सामग्री से किया जानेवाला पूजन) सहित पूजा करके जो साधक स्वाधिष्ठान चक्र में मन को स्थापित करता है उसकी साधना सफल हो जाती है और व्यक्ति की कुण्डलनी शक्ति जागृत हो जाती है. जो व्यक्ति भक्ति भाव एवं श्रद्धा से दुर्गा पूजा के दूसरे दिन मॉ ब्रह्मचारिणी की पूजा करते हैं उन्हें सुख, आरोग्य की प्राप्ति होती है और प्रसन्न रहता है, उसे किसी प्रकार का भय नहीं सताता है.
Monday, October 12, 2015
शैलपुत्री देवी
मंगलवार से चैत्र नवरात्रि का शुभारंभ हो गया है। नवरात्र के पहले दिन देवी मां के पहले स्वरूप शैलपुत्री की पूजा अर्चना की जाती है। नवरात्रों में देशभर के मंदिर सजाए जाते हैं, जहां पूरे नौ दिन मां के सभी रूपों की पूजा की जाती है। काशी के अलइपुरा इलाके स्थित देवी शैलपुत्री मंदिर में भक्तों की काफी भीड़ उमड़ रही है। दूर-दराज से श्रद्धालु देवी मां के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। भक्त मां षैलपुरी से अपने परिवार की सुख-शांति की मन्नतें मांग रहे हैं। वहीं पुलिस प्रशासन द्वारा मंदिरों में सुरक्षा कर्मी तैनात किए हैं, ताकि किसी प्रकार की कोई अनहोनी घटना न हो पाए।
बता दें कि, भगवती दुर्गा का पहला स्वरूप शैलपुत्री का है। हिमालय के यहां जन्म लेने से उन्हें शैलपुत्री कहा गया। इनका वाहन वृषभ है। उनके दाएं हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल है। इन्हे पार्वती का स्वरूप भी माना गया है। ऐसी मान्यता है कि देवी के इस रूप ने ही शिव की कठोर तपस्या की थी। इनके दर्शन मात्र से सभी वैवाहिक कष्ट दूर हो जाते हैं।
बता दें कि, भगवती दुर्गा का पहला स्वरूप शैलपुत्री का है। हिमालय के यहां जन्म लेने से उन्हें शैलपुत्री कहा गया। इनका वाहन वृषभ है। उनके दाएं हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल है। इन्हे पार्वती का स्वरूप भी माना गया है। ऐसी मान्यता है कि देवी के इस रूप ने ही शिव की कठोर तपस्या की थी। इनके दर्शन मात्र से सभी वैवाहिक कष्ट दूर हो जाते हैं।
Friday, October 2, 2015
लाल बहादुर शास्त्री
श्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1901 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी से सात मील दूर एक छोटे से रेलवे टाउन, मुगलसराय में हुआ था। उनके पिता एक स्कूल शिक्षक थे। जब लाल बहादुर शास्त्री केवल डेढ़ वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया था। उनकी माँ अपने तीनों बच्चों के साथ अपने पिता के घर जाकर बस गईं।
उस छोटे-से शहर में लाल बहादुर की स्कूली शिक्षा कुछ खास नहीं रही लेकिन गरीबी की मार पड़ने के बावजूद उनका बचपन पर्याप्त रूप से खुशहाल बीता।
उन्हें वाराणसी में चाचा के साथ रहने के लिए भेज दिया गया था ताकि वे उच्च विद्यालय की शिक्षा प्राप्त कर सकें। घर पर सब उन्हें नन्हे के नाम से पुकारते थे। वे कई मील की दूरी नंगे पांव से ही तय कर विद्यालय जाते थे, यहाँ तक की भीषण गर्मी में जब सड़कें अत्यधिक गर्म हुआ करती थीं तब भी उन्हें ऐसे ही जाना पड़ता था।
बड़े होने के साथ-ही लाल बहादुर शास्त्री विदेशी दासता से आजादी के लिए देश के संघर्ष में अधिक रुचि रखने लगे। वे भारत में ब्रिटिश शासन का समर्थन कर रहे भारतीय राजाओं की महात्मा गांधी द्वारा की गई निंदा से अत्यंत प्रभावित हुए। लाल बहादुर शास्त्री जब केवल ग्यारह वर्ष के थे तब से ही उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर कुछ करने का मन बना लिया था।
गांधी जी ने असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए अपने देशवासियों से आह्वान किया था, इस समय लाल बहादुर शास्त्री केवल सोलह वर्ष के थे। उन्होंने महात्मा गांधी के इस आह्वान पर अपनी पढ़ाई छोड़ देने का निर्णय कर लिया था। उनके इस निर्णय ने उनकी मां की उम्मीदें तोड़ दीं। उनके परिवार ने उनके इस निर्णय को गलत बताते हुए उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वे इसमें असफल रहे। लाल बहादुर ने अपना मन बना लिया था। उनके सभी करीबी लोगों को यह पता था कि एक बार मन बना लेने के बाद वे अपना निर्णय कभी नहीं बदलेंगें क्योंकि बाहर से विनम्र दिखने वाले लाल बहादुर अन्दर से चट्टान की तरह दृढ़ हैं।
लाल बहादुर शास्त्री ब्रिटिश शासन की अवज्ञा में स्थापित किये गए कई राष्ट्रीय संस्थानों में से एक वाराणसी के काशी विद्या पीठ में शामिल हुए। यहाँ वे महान विद्वानों एवं देश के राष्ट्रवादियों के प्रभाव में आए। विद्या पीठ द्वारा उन्हें प्रदत्त स्नातक की डिग्री का नाम ‘शास्त्री’ था लेकिन लोगों के दिमाग में यह उनके नाम के एक भाग के रूप में बस गया।
1927 में उनकी शादी हो गई। उनकी पत्नी ललिता देवी मिर्जापुर से थीं जो उनके अपने शहर के पास ही था। उनकी शादी सभी तरह से पारंपरिक थी। दहेज के नाम पर एक चरखा एवं हाथ से बुने हुए कुछ मीटर कपड़े थे। वे दहेज के रूप में इससे ज्यादा कुछ और नहीं चाहते थे।
1930 में महात्मा गांधी ने नमक कानून को तोड़ते हुए दांडी यात्रा की। इस प्रतीकात्मक सन्देश ने पूरे देश में एक तरह की क्रांति ला दी। लाल बहादुर शास्त्री विह्वल ऊर्जा के साथ स्वतंत्रता के इस संघर्ष में शामिल हो गए। उन्होंने कई विद्रोही अभियानों का नेतृत्व किया एवं कुल सात वर्षों तक ब्रिटिश जेलों में रहे। आजादी के इस संघर्ष ने उन्हें पूर्णतः परिपक्व बना दिया।
आजादी के बाद जब कांग्रेस सत्ता में आई, उससे पहले ही राष्ट्रीय संग्राम के नेता विनीत एवं नम्र लाल बहादुर शास्त्री के महत्व को समझ चुके थे। 1946 में जब कांग्रेस सरकार का गठन हुआ तो इस ‘छोटे से डायनमो’ को देश के शासन में रचनात्मक भूमिका निभाने के लिए कहा गया। उन्हें अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश का संसदीय सचिव नियुक्त किया गया और जल्द ही वे गृह मंत्री के पद पर भी आसीन हुए। कड़ी मेहनत करने की उनकी क्षमता एवं उनकी दक्षता उत्तर प्रदेश में एक लोकोक्ति बन गई। वे 1951 में नई दिल्ली आ गए एवं केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई विभागों का प्रभार संभाला – रेल मंत्री; परिवहन एवं संचार मंत्री; वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री; गृह मंत्री एवं नेहरू जी की बीमारी के दौरान बिना विभाग के मंत्री रहे। उनकी प्रतिष्ठा लगातार बढ़ रही थी। एक रेल दुर्घटना, जिसमें कई लोग मारे गए थे, के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते हुए उन्होंने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। देश एवं संसद ने उनके इस अभूतपूर्व पहल को काफी सराहा। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने इस घटना पर संसद में बोलते हुए लाल बहादुर शास्त्री की ईमानदारी एवं उच्च आदर्शों की काफी तारीफ की। उन्होंने कहा कि उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री का इस्तीफा इसलिए नहीं स्वीकार किया है कि जो कुछ हुआ वे इसके लिए जिम्मेदार हैं बल्कि इसलिए स्वीकार किया है क्योंकि इससे संवैधानिक मर्यादा में एक मिसाल कायम होगी। रेल दुर्घटना पर लंबी बहस का जवाब देते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने कहा; “शायद मेरे लंबाई में छोटे होने एवं नम्र होने के कारण लोगों को लगता है कि मैं बहुत दृढ नहीं हो पा रहा हूँ। यद्यपि शारीरिक रूप से में मैं मजबूत नहीं है लेकिन मुझे लगता है कि मैं आंतरिक रूप से इतना कमजोर भी नहीं हूँ।”
अपने मंत्रालय के कामकाज के दौरान भी वे कांग्रेस पार्टी से संबंधित मामलों को देखते रहे एवं उसमें अपना भरपूर योगदान दिया। 1952, 1957 एवं 1962 के आम चुनावों में पार्टी की निर्णायक एवं जबर्दस्त सफलता में उनकी सांगठनिक प्रतिभा एवं चीजों को नजदीक से परखने की उनकी अद्भुत क्षमता का बड़ा योगदान था।
तीस से अधिक वर्षों तक अपनी समर्पित सेवा के दौरान लाल बहादुर शास्त्री अपनी उदात्त निष्ठा एवं क्षमता के लिए लोगों के बीच प्रसिद्ध हो गए। विनम्र, दृढ, सहिष्णु एवं जबर्दस्त आंतरिक शक्ति वाले शास्त्री जी लोगों के बीच ऐसे व्यक्ति बनकर उभरे जिन्होंने लोगों की भावनाओं को समझा। वे दूरदर्शी थे जो देश को प्रगति के मार्ग पर लेकर आये। लाल बहादुर शास्त्री महात्मा गांधी के राजनीतिक शिक्षाओं से अत्यंत प्रभावित थे। अपने गुरु महात्मा गाँधी के ही लहजे में एक बार उन्होंने कहा था – “मेहनत प्रार्थना करने के समान है।” महात्मा गांधी के समान विचार रखने वाले लाल बहादुर शास्त्री भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठ पहचान हैं।
Thursday, October 1, 2015
जीवित्पुत्रिका व्रत
पुत्र-पुत्रियों की लंबी उम्र की कामना के लिए किया जानेवाला जिउतिया व्रत 5 अक्टूबर को मनाया जायेगा. 4 अक्टूबर को नहाय -खाय के साथ व्रत की शुरुआत होगी. व्रती महिलाएं स्नान-ध्यान कर नोनी व सतपुतिया की बनी सब्जी, मडुआ की रोटी व पुआ खायेंगी. दूसरे दिन मंगलवार को निजर्ला उपवास के साथ महिलाएं व्रत करेंगी. आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी यानी 5 अक्टूबर को महिलाएं जिउतिया व्रत रखेंगी. व्रत के दौरान व्रती माताएं निजर्ला उपवास रहेंगी.
व्रती मताएं संध्या के समय पूजन कर सकेंगी. पूजन के दौरान कुश के बने लव-कुश का पूजन कर भगवान जिउतवाहन की कथा सुनी जाती है. व्रत के दूसरे दिन बुधवार को 6 अक्टूबर की सुबह पारण के बाद चौबीस घंटे का यह निजर्ला व्रत संपन्न होगा.दिन भर व्रत के बाद शाम में जिउतवाहन की कथा सुनी जाती है. इस व्रत को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं.
इस व्रत की एक बहुत ही प्रचलित लोक कथा है। जिसे व्रत करनेवाली स्त्रियां बड़े प्रेम से सुनती हैं।
किसी जंगल में एक सेमर के वृक्ष पर एक चील रहती थी और उसी से कुछ दूर पर एक झाड़ी से भरी खंदक में एक सिआरिन की माँद थी। दोनों में बहुत पटती थी। चील जो कुछ शिकार करती उसमें से सिआरिन को भी हिस्सा देती और सिआरिन भी चील के उपकारों का यदा-कदा बदला चुकाया करती। वह अपने भोजन में से कुछ न कुछ बचाकर चील के लिए अवश्य लाती। इस प्रकार दोनों के दिन बड़े सुख से कट रहे थे।
एक बार उसी जंगल में पास के गाँव की स्त्रियां जिउतिया का व्रत कर रही थीं। चील ने उसे देखा। उसे अपने पूर्वजन्म की याद थी उसने भी यह व्रत करने की प्रतिज्ञा की। दोनों ने बड़ी निष्ठा और श्रद्धा से व्रत को पूरा किया। दोनों दिन भर निर्जल और निराहार रहकर सभी प्राणियों की कल्याण-कामना करती रहीं। किन्तु जब रात्रि आई तो सिआरिन को भूख और प्यास से बेचैनी होने लगी। उसे एक क्षण काटना भी कठिन हो गया। वह चुपचाप जंगल की ओर गई और वहाँ शिकारी जानवरों के खाने से बचे माँस और हड्डियों को लाकर धीरे-धीरे खाने लगी। चील को पहले से कुछ भी मालूम नहीं था। किन्तु जब सिआरिन ने हड्डी चबाते हुए कुछ कड़-कड़ की आवाज की तो चील ने पूछा- बहिन तुम क्या खा रही हो ?
सिआरिन बोली- बहिन क्या करूँ ! भूख के मारे मेरी हड्डियाँ चड़मड़ा रही हैं ऐसे व्रत में भला खाना-पीना कहाँ हो सकता है।
किन्तु चील इतनी बेवकूफ नहीं थी। वह सब जान गई थी। उसने कहा- बहिन तुम झूठ क्यों बोल रही हो। हड्डी चबा रही हो और बताती हो कि भूख के मारे हड्डी चड़मड़ा रही है। तुम्हे तो पहले ही सोच लेना चाहिए था कि व्रत तुमसे निभेगा या नहीं।
सिआरिन लज्जित होकर दूर चली गई। उसे भूख और प्यास के कारण इतनी बेचैनी हो रही थी कि दूर जाकर उसने भर पेट खाकर खूब पानी पिया। किन्तु चील रात भर वैसे ही पड़ी रही। परिणाम भी उसी तरह हुआ। चील को जितने बच्चे हुए सभी स्वस्थ, सुन्दर और सदाचारी किन्तु सिआरिन के जितने बच्चे हुए वे थोड़े ही दिनों बाद मरते गए।
इसलिए स्त्रियां व्रतकथा सुनने के बाद यह कामना करती हैं कि चील की तरह सब कोई हों और सिआरिन की तरह कोई नहीं।
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