Wednesday, September 16, 2015

Ganesh Chaturthi

Ganesh Chaturthi, also known as Vinayaka Chaturthi is an Indian festival that marks the birthday of Lord Ganesha. This auspicious festival is observed in the month of Bhadra (mid August-mid September) according to the Hindu calendar.
anesha, one of the most beloved gods is known by 108 different names in our culture. He is considered to be a symbol of good fortune, wisdom, prosperity and wealth.
This festival is celebrated with extreme devotion and joy in many states of India and even outside the country. Maharashtra, Goa, Kerela, Tamil Nadu are some of the cities that have been home to these celebrations since ages.
With Ganesh Chaturthi just a day away, we bring you the history and different traditions and rituals that are practiced during the Ganesh Utsav.
Out of all the stories linked to the history of this festival, the most relevant one dates back to the time of Lord Shiva and Goddess Parvati. It is believed that Parvati is the creator of Ganesha. The story says that Parvati used her sandalwood paste and created Ganesha in the absence of Shiva. She gave him the work of guarding her bathroom door while she was bathing. After Shiva returned home, Ganesha and Shiva got into a tiff due to which Shiva severed the head of the child. Witnessing this site, Parvati enraged and Lord Shiva promised getting Ganesh back to life. The followers searched for a child’s head facing north, but all they could find was an elephant’s head. And that’s how our Gajanana was born.
Traditions and Rituals
Weeks before Ganesh Chaturthi, excitement settles in. Various artistic clay models, varying in sizes and poses, are prepared by the artisans.
These statues are installed in colorfully decorated ‘pandals’ in homes, localities and temples. Garlands and lights add up to the beauty of the statue. A ritual known as Pranapratishhtha, that involves chanting of mantras by the priest is a common sight seen.
After this, the prayers are offered in 16 different ways in a ritual called Shhodashopachara.
Finally, there is a ritual known as Uttarpuja, which means bidding farewell to lord Ganesha with due reverence. After this ritual, there is a ceremony of immersing the statue in water, which is known as Ganpati Visarjan.
‘Ganpati Bappa Morya, a common chanting that evokes the feelings of devotees is commonly heard during celebrations.
This festival not only involves prayers, but also takes in account the time for cultural activities like dancing, singing, orchestra and theatre performances. A lot of community activities are also a part of the celebrations.
The main attraction for foodies in this festival is Modak, a dumpling of rice or flour stuffed with grated jaggery, coconuts and dry fruits. Karanji, similar to modak is another famous dish that makes an indispensable part of the celebrations.


गणेशोत्सव

गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दर्शी तक गणेशोत्सव दस दिनों तक मनाया जाता है. भाद्रपद शुक्ल की चतुर्थी ही गणेश चतुर्थी कहलाती है.
हिंदू धर्म-संस्कृति में अनेक देवी-देवताओं को पूजा जाता है. इन सभी में सबसे पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है. उनको विघ्ननाशक और बुद्धिदाता भी कहा जाता है. किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत उन्हीं का नाम लेकर की जाती है. 
हाथी का सिर होने के चलते उन्हें ‘गजानन’ भी कहते हैं. देश में मनाया जाने वाला गणेशोत्सव उनके महत्व को दर्शाता है. गणेशोत्सव गणेश चतुर्थी से शुरू होता है. विनायक चतुर्थी व्रत भगवान गणेश के जन्मदिन पर रखा जाता है. 
वैसे तो देश के लगभग सभी शहरों में इस पर्व को मनाया जाता है लेकिन महाराष्ट्र में इस पर्व को विशेष धूमधाम से मनाये जाने की परंपरा है
यहां लोग घरों, मुहल्लों और चौराहों पर भव्य पंडाल सजाकर गणेशजी की स्थापना करते हैं. गणेश चतुर्थी से अनन्त चतुर्दशी तक अर्थात दस दिन गणेशोत्सव मनाया जाता है. इस साल गणेश चतुर्थी 19 सितम्बर को है यानी गणेशोत्सव 29 सितम्बर तक मनाया जाएगा.
लोककथा एक बार देवी पार्वती स्नान करने के लिए भोगावती नदी गयीं. उन्होंने अपने तन के मैल से एक जीवंत मूर्ति बनायी और उसका नाम ’गणेश‘ रखा. पार्वती ने उससे कहा-हे पुत्र! तुम द्वार पर बैठ जाओ और किसी पुरुष को अंदर मत आने देना. 
कुछ देर बाद स्नान कर के भगवान शिव वहां आए. गणेश ने उन्हें देखा तो रोक दिया. इसे शिव ने अपना अपमान समझा. क्रोधित होकर उन्होंने गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया और भीतर चले गए. 
महादेव को नाराज देखकर पार्वती ने समझा कि भोजन में विलंब के कारण शायद वे नाराज हैं. उन्होंने तत्काल दो थालियों में भोजन परोसकर शिव को बुलाया. तब दूसरी थाली देखकर शिव ने आश्र्चयचकित होकर पूछा कि दूसरी थाली किसके लिए है? 
पार्वती बोलीं, दूसरी थाली मेरे पुत्र गणेश के लिए है जो बाहर द्वार पर पहरा दे रहा है. क्या आपने आते वक्त उसे नहीं देखा? यह बात सुनकर शिव बहुत हैरान हुए. उन्होंने कहा, देखा तो था मैंने. पर उसने मेरा रास्ता रोका. इस कारण मैंने उद्दंड बालक समझकर उसका सिर काट दिया. 
यह सुनकर पार्वती विलाप करने लगीं. तब पार्वती को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव ने एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर बालक के धड़ से जोड़ दिया. इस प्रकार पार्वती पुत्र गणेश को पाकर प्रसन्न हो गयीं. 
उन्होंने पति तथा पुत्र को भोजन परोस कर स्वयं भोजन किया. यह घटना भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी पर हुई थी, इसलिए यह तिथि पुण्य पर्व के रूप में मनाई जाती है.
व्रत की विधि व्रत के दिन सुबह उठकर स्नान कर समूचे घर को गंगाजल से शुद्ध करना चाहिए. इसके पश्चात भगवान गणेश का धूप, दीप, पुष्प, फल, नैवेद्य और जल से पूजन करना चाहिए. 
भगवान गणेश को लाल वस्त्र धारण कराया जाता है. यदि वस्त्र धारण कराना संभव ना हो तो लाल वस्त्र दान करना चाहिए. देसी घी के बने 21 लड्डुओं के साथ गणेशजी की पूजा करनी चाहिए. इसमें से दस लड्डू अपने पास रखकर शेष ब्राह्मणों को दान कर देना चाहिए.


विश्वकर्मा जयंती

आज देव शिल्पी विश्वकर्मा का जन्मदिन है। इनके जन्मदिन को देश भर में विश्वकर्मा जयंती अथवा विश्वकर्मा पूजा के नाम से मनाया जाता है। देवशिल्पी विश्वकर्मा ही देवताओं के लिए महल, अस्त्र-शस्त्र, आभूषण आदि बनाने का काम करते हैं। इसलिए यह देवताओं के भी आदरणीय हैं।
इन्द्र के सबसे शक्तिशाली अस्त्र वज्र का निर्माण भी विश्वकर्मा ने ही किया है। शास्त्रों के अनुसार भगवान विश्वकर्मा ने सृष्टि की रचना में ब्रह्मा की सहायता की और संसार की रूप रेखा का नक्शा तैयार किया। मान्यता है कि विश्वकर्मा ने उड़ीसा में स्थित भगवान जगन्नाथ सहित, बलभद्र एवं सुभद्रा की मूर्ति का निर्माण भी विश्वकर्मा के हाथाों ही हुआ माना जाता है।
विश्वकर्मा ने किया लंका का निर्माण
रामायण में वर्णन मिलता है कि रावण की लंका सोने की बनी थी। ऐसी कथा है कि भगवान शिव ने पार्वती से विवाह के बाद विश्वकर्मा से सोने की लंका का निर्माण करवाया था। शिव जी ने रावण को पंडित के तौर पर गृह पूजन के लिए बुलवाया।
पूजा के पश्चात रावण ने भगवान शिव से दक्षिणा में सोने की लंका ही मांग ली। सोने की लंका को जब हनुमान जी ने सीता की खोज के दौरान जला दिया तब रावण ने पुनः विश्वकर्मा को बुलवाकर उनसे सोने की लंका का पुनर्निमाण करवाया।
आज के युग में विश्वकर्मा पूजा 
देव शिल्पी होने के कारण भगवान विश्वकर्मा मशीनरी एवं शिल्प उद्योग से जुड़े लोगों के लिए प्रमुख देवता हैं। वर्तमान में हर व्यक्ति सुबह से शाम तक किसी न किसी मशीनरी का इस्तेमाल जरूर करता है जैसे कंप्यूटर, मोटर साईकल, कार, पानी का मोटर, बिजली के उपकरण आदि। भगवान विश्वकर्मा इन सभी के देवता माने जाते हैं।
इसलिए वर्तमान युग में विश्वकर्मा का महत्व दिन ब दिन बढ़ता जा रहा है। यही वजह है कि पहले सिर्फ शिल्पकार ही इनकी पूजा किया करते थे लेकिन अब घर-घर में इनकी पूजा होने लगी है।
ऐसी मान्यता है कि विश्वकर्मा की पूजा करने से मशनरी लंबे समय तक साथ निभाती हैं एवं जरूरत के समय धोखा नहीं देती है। विश्वकर्मा की पूजा का एक अच्छा तरीका यह है कि आप जिन मशीनरी का उपयोग करते हैं उनकी आज साफ-सफाई करें।
उनकी देखरेख में जो भी कमी है उसे जांच करके उसे दुरूस्त कराएं और खुद से वादा करें कि आप अपनी मशीनरी का पूरा ध्यान रखेंगे। विश्वकर्मा की पूजा का यह मतलब नहीं है कि आप उनकी तस्वीर पर फूल और माला लटकाकर निश्चिंत हो जाएं।

मंगला गौरी

निःसंतान दम्पत्तियों को बच्चे का सुख देने वाली और अविवाहित कन्याओं को सर्वगुण सम्पन्न वर प्रदान करने वाली मां मंगला गौरी के प्रति भक्तों की असीम आस्था रहती है। मां की अनुकम्पा से भक्तों की सारी मनोकामनायें पूरी हो जाती है। मान्यता के अनुसार एक बार सूर्य पंचगंगा घाट (पंचनंदा तीर्थ) पर शिवलिंग स्थापित करके घोर तपस्या करने लगे। उनके तप से उनकी किरणें आग के समान गर्म होने लगीं। अन्ततः उनके तप के प्रभाव से किरणें इतनी तीक्ष्ण हो गयीं कि मानव सहित सभी प्राणी जहां के तहां बुत बन गये। चारो ओर हाहाकार मच गया। अचानक हुई इस अप्राकृतिक स्थिति को जानने के लिए भगवान शिव मां पार्वती के साथ तपस्या में लीन सूर्यदेव के सामने प्रकट हुए। महादेव और मां पार्वती को अपने सम्मुख पाकर सूर्यदेव भावविह्वल हो गये और उनकी स्तुति करने लगे। सूर्य देव की इस असीम भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान स्वरूप दैव शक्तियां प्रदान की। साथ ही कहा कि यहां स्थापित देवी जिन्हें कालांतर में मंगला गौरी के नाम से जाना जायेगा। इनके दर्शन-पूजन करने वाले आस्थावान भक्तों को सभी प्रकार के दुखों से दूर कर मां सुख सम्पत्ति प्रदान करेंगी। वहीं, अविवाहित कन्याएं यदि मां का दर्शन करेंगी तो उन्हें सर्वगुण सम्पन्न वर और निःसंतान दम्पत्ति को दर्शन करने से बच्चे की प्राप्ति होगी। धीर-धीरे इस मंदिर की ख्याति बढ़ती गयी। बाद में मां के इस मंदिर का निर्माण किसी भक्त ने करवाया। इस मंदिर को पंचायतन मंदिर भी कहा जाता है। मंदिर के मध्य में गौरीगौश्तीश्वर शिवलिंग स्थापित हैं। मंदिर में एक कोने में मां की दिव्य प्रतिमा स्थापित है। वहीं, मंदिर में आदि केशव और हनुमान जी की मूर्ति को रामदास जी ने स्थापित किया है। मंदिर में मर्तंड भैरव की भी मूर्ति है। जिनके दर्शन-पूजन करने लोग आते हैं। मंदिर में बड़ा कार्यक्रम पूष महीने की शुक्लपक्ष चतुर्दशी को मां का अन्नकूट महोत्सव होता है। इस दौरान कई प्रकार के व्यंजन बनाकर मां को अर्पित किया जाता है। वहीं चैत्र नवरात्र में अष्टमी के दिन इन्हें गौरी के रूप में पूजा जाता है। प्रत्येक मंगलवार को इस मंदिर में काफी संख्या में श्रद्धालु मां के दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। यह मंदिर प्रातःकाल 4 से दोपहर 12 बजे तक खुला रहता है। फिर पुनः शाम को 4 बजे से खुलता है जो रात 9 बजे तक खुला रहता है। मां की आरती दो बार होती है। सुबह की आरती 5 बजे एवं रात की शयन आरती 9 बजे होती है। यह मंदिर k 24/34 पंचगंगा घाट पर स्थित है। कैन्ट स्टेशन से करीब 8 किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर तक पहुंचने के लिए ऑटो द्वारा मैदागिन चौराहे पर पहुंचकर पैदल भैरवनाथ होते हुए सकरी गलियों द्वारा पहुंचा जा सकता है।




Friday, September 11, 2015

Hartalika Teej

Hartalika Teej in 2015 is schedule on the 16th date of September. Hartalika Teej is a Hindu fasting observed by Hindu women. It is dedicated to Goddess Parvati. Hartalika Teej falls on the third day of the first fortnight of the month of ‘Bhadra’. The festival continues three days and is celebrated by women in honor of Parvati Ma. It is one of three Teej festivals and most popularly celebrated in the Northern and western parts of India. The festival of Hartalika Teez is mainly carried on in Madhya Pradesh, Chhattisgarh, Bihar, Jharkhand, Rajasthan and is some parts of Maharashtra.
According to Hindu mythology Parvati was in love with Shiva. Being an ascetic Lord shiva was not aware of her. Parvati performed penance on the Himalayas for many years and finally Shiva took notice of her. Then Lord shiva came to know about her love and devotion towards him and agreed to marry her. Since then Parvati has been worshipped as Haritalika.
Unmarried girls keep the fast and pray to Goddesses Parvati in hope to get good husbands. Hartalika Teej Vrat is observed by both married and unmarried women. Married women keep the Vrat in order to achieve happy and peaceful married life. Married ladies come back to their parent’s home to celebrate the festival. Some even maintain nirjala vrata (without water) on these three days and refrain from sleep all the three days. This is symbolic of the penance which Goddesses Parvati undertook to get Shiva as her husband. During the Vrat food is being offered to Brahmins and young girls.
Hartalika Teej is also the time to adorn oneself with new clothes and jewelry. In Maharashtra women wear green clothes, green bangles, golden bindis and kajal for luck. Applying mehndi on hands and feet is one of the unique features of Hartalike Teej celebrations. They offer fresh fruits and green vegetables to the goddesses and beautifully painted coconut to their female relatives. After the rituals get over women take a feast of rice patolis and jaggery steamed in banana leaves, mixed vegetables cooked with spices and coconut milk, a sweet made from coconut milk and rice. Tender coconut water is taken as a treat of the day.
There are several regional variations of this Hartalike Teej Vrat but the purpose of observing it remains the same. Two other Teej Vrats are Hariyali Teej and Kajari Teej but Hartalike Teej is the most important. For performing the puja women gather at a nearby temple or a garden. A semi-circle is created and an idol of Goddess Parvati is kept in the middle. The main puja begins with holy offerings of flowers, fruits, sweets and coins. A pujarin or all the ladies together narrate the holy Teej Katha. Young girls also sit and listen to the katha. While listening to the holy katha women should put their mind and thoughts towards their soul mate. After the puja gets over women offer flowers, fruits and many other holy items to Goddesses Parvati and seek her blessings for marital bliss. Another important part of the puja is oil lamp that needs to keep alight throughout the night and if it dies away it is considered to be a bad omen. At some places after paying homage to Goddess Parvati, women take a bath with red mud found on the roots of sacred Datiwan bush. This is a act of purification that is believed to absolve women for all accumulated sins after this holy bath.


हरतालिका तीज

इस वर्ष हरतालिका तीज 16 सितंबर को मनाई जाएगी।भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला अखंड सौभाग्य की कामना का व्रत हरतालिका तीज को महिलाये करती है...तीज के दिन भगवती पार्वती सौ वर्षों की तपस्या साधना के बाद भगवान शिव से मिली थीं... इस दिन मां पार्वती की पूजा की जाती है.

विधि
इस दिन महिलाएं निर्जल रहकर व्रत करती है। इस दिन भगवान शंकर-पार्वती का बालू की मूर्ति बनाकर पूजन किया जाता है। अपने घर को साफ-स्वच्छ कर तोरण-मंडप आदि से सजाया जाता है, एक पवित्र चौकी पर शुद्ध मिट्टी में गंगाजल मिलाकर शिवलिंग, रिद्धि-सिद्धि सहित गणेश, पार्वती एवं उनकी सखी की आकृति (प्रतिमा) बनाएं। प्रतिमाएं बनाते समय भगवान का स्मरण करें। देवताओं का आह्वान कर षोडशोपचार पूजन करें। इस व्रत का पूजन रात्रि भर चलता है। इस दौरान महिलाएं जागरण करती हैं, और कथा-पूजन के साथ कीर्तन करती हैं। प्रत्येक प्रहर में भगवान सदाशिव को सभी प्रकार की वनस्पतियां जैसे बिल्व-पत्र, आम के पत्ते, चंपक के पत्ते एवं केवड़ा अर्पण किया जाता है। आरती और स्तोत्र द्वारा आराधना की जाती है। भगवती-उमा की अर्चना के लिए निम्न मंत्रों का प्रयोग होता है- ऊँ उमायै नम:,ऊँ पार्वत्यै नम:, ऊँ जगद्धात्र्यै नम:, ऊँ जगत्प्रतिष्ठायै नम:, ऊँ शांतिरूपिण्यै नम:, ऊँ शिवायै नम:- भगवान शिव की आराधना इन मंत्रों से करें-ऊँ हराय नम:, ऊँ महेश्वराय नम:, ऊँ शम्भवे नम:, ऊँ शूलपाणये नम:, ऊँ पिनाकवृषे नम:, ऊँ शिवाय नम:, ऊँ पशुपतये नम:, ऊँ महादेवाय नम:

हरितालिका व्रत कथा
कहते हैं कि इस व्रत के माहात्म्य की कथा भगवान् शिव ने पार्वती जी को उनके पूर्व जन्म का स्मरण करवाने के उद्देश्य से इस प्रकार से कही थी-
“हे गौरी! पर्वतराज हिमालय पर गंगा के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर घोर तप किया था. इस अवधि में तुमने अन्न ना खाकर केवल हवा का ही सेवन के साथ तुमने सूखे पत्ते चबाकर काटी थी. माघ की शीतलता में तुमने निरंतर जल में प्रवेश कर तप किया था. वैशाख की जला देने वाली गर्मी में पंचाग्नी से शरीर को तपाया. श्रावण की मुसलाधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न जल ग्रहन किये व्यतीत किया. तुम्हारी इस कष्टदायक तपस्या को देखकर तुम्हारे पिता बहुत दुःखी और नाराज़ होते थे. तब एक दिन तुम्हारी तपस्या और पिता की नाराज़गी को देखकर नारदजी तुम्हारे घर पधारे.

तुम्हारे पिता द्वारा आने का कारण पूछने पर नारदजी बोले – ‘हे गिरिराज! मैं भगवान् विष्णु के भेजने पर यहाँ आया हूँ. आपकी कन्या की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर वह उससे विवाह करना चाहते हैं. इस बारे में मैं आपकी राय जानना चाहता हूँ.’ नारदजी की बात सुनकर पर्वतराज अति प्रसन्नता के साथ बोले- ‘श्रीमान! यदि स्वंय विष्णुजी मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं तो मुझे क्या आपत्ति हो सकती है. वे तो साक्षात ब्रह्म हैं. यह तो हर पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख-सम्पदा से युक्त पति के घर कि लक्ष्मी बने.’

नारदजी तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर विष्णुजी के पास गए और उन्हें विवाह तय होने का समाचार सुनाया. परंतु जब तुम्हे इस विवाह के बारे में पता चला तो तुम्हारे दुःख का ठिकाना ना रहा. तुम्हे इस प्रकार से दुःखी देखकर, तुम्हारी एक सहेली ने तुम्हारे दुःख का कारण पूछने पर तुमने बताया कि – ‘मैंने सच्चे मन से भगवान् शिव का वरण किया है, किन्तु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी के साथ तय कर दिया है. मैं विचित्र धर्मसंकट में हूँ. अब मेरे पास प्राण त्याग देने के अलावा कोई और उपाय नहीं बचा.’ तुम्हारी सखी बहुत ही समझदार थी. उसने कहा – ‘प्राण छोड़ने का यहाँ कारण ही क्या है? संकट के समय धैर्य से काम लेना चाहिये. भारतीय नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि जिसे मन से पति रूप में एक बार वरण कर लिया, जीवनपर्यन्त उसी से निर्वाह करे. सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो भगवान् भी असहाय हैं. मैं तुम्हे घनघोर वन में ले चलती हूँ जो साधना थल भी है और जहाँ तुम्हारे पिता तुम्हे खोज भी नहीं पायेंगे. मुझे पूर्ण विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे.’

तुमने ऐसा ही किया. तुम्हारे पिता तुम्हे घर में न पाकर बड़े चिंतित और दुःखी हुए. वह सोचने लगे कि मैंने तो विष्णुजी से अपनी पुत्री का विवाह तय कर दिया है. यदि भगवान् विष्णु बारात लेकर आ गये और कन्या घर पर नहीं मिली तो बहुत अपमान होगा, ऐसा विचार कर पर्वतराज ने चारों ओर तुम्हारी खोज शुरू करवा दी. इधर तुम्हारी खोज होती रही उधर तुम अपनी सहेली के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन रहने लगीं. भाद्रपद तृतीय शुक्ल को हस्त नक्षत्र था. उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण किया. रात भर मेरी स्तुति में गीत गाकर जागरण किया. तुम्हारी इस कठोर तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन हिल उठा और मैं शीघ्र ही तुम्हारे पास पहुँचा और तुमसे वर मांगने को कहा तब अपनी तपस्या के फलीभूत मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा – ‘मैं आपको सच्चे मन से पति के रूप में वरण कर चुकी हूँ. यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर यहाँ पधारे हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिये. ‘तब ‘तथास्तु’ कहकर मैं कैलाश पर्वत पर लौट गया.

प्रातः होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री नदी में प्रवाहित करके अपनी सखी सहित व्रत का वरण किया. उसी समय गिरिराज अपने बंधु – बांधवों के साथ तुम्हे खोजते हुए वहाँ पहुंचे. तुम्हारी दशा देखकर अत्यंत दुःखी हुए और तुम्हारी इस कठोर तपस्या का कारण पुछा. तब तुमने कहा – ‘पिताजी, मैंने अपने जीवन का अधिकांश वक़्त कठोर तपस्या में बिताया है. मेरी इस तपस्या के केवल उद्देश्य महादेवजी को पति के रूप में प्राप्त करना था. आज मैं अपनी तपस्या की कसौटी पर खरी उतर चुकी हूँ. चुंकि आप मेरा विवाह विष्णुजी से करने का निश्चय कर चुके थे, इसलिये मैं अपने आराध्य की तलाश में घर से चली गयी. अब मैं आपके साथ घर इसी शर्त पर चलूंगी कि आप मेरा विवाह महादेवजी के साथ ही करेंगे. पर्वतराज ने तुम्हारी इच्छा स्वीकार करली और तुम्हे घर वापस ले गये. कुछ समय बाद उन्होने पूरे विधि – विधान के साथ हमारा विवाह किया.”

भगवान् शिव ने आगे कहा – “हे पार्वती! भाद्र पद कि शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के परिणाम स्वरूप हम दोनों का विवाह संभव हो सका. इस व्रत का महत्त्व यह है कि मैं इस व्रत को पूर्ण निष्ठा से करने वाली प्रत्येक स्त्री को मन वांछित फल देता हूँ.” भगवान् शिव ने पार्वतीजी से कहा कि इस व्रत को जो भी स्त्री पूर्ण श्रद्धा से करेगी उसे तुम्हारी तरह अचल सुहाग प्राप्त होगा.

इस व्रत को ‘हरितालिका’ इसलिये कहा जाता है क्योंकि पार्वती कि सखी उन्हें पिता और प्रदेश से हर कर जंगल में ले गयी थी. ‘हरित’ अर्थात हरण करना और ‘तालिका’ अर्थात सखी. मान्यता है कि इस दिन जो महिलाएं विधि-विधानपूर्वक और पूर्ण निष्ठा से इस व्रत को करती हैं, वह अपने मन के अनुरूप पति को प्राप्त करती हैं.