Sunday, September 6, 2015

पंचकोशी मंदिर

पांच दिन में पूरी की जाने वाली ८४ कोष की पंचकोशी परिक्रमा काशी के पंचकोशी मंदिर  में महज ८४ क़दमों में पूरी कर इसका पुण्य लिया जा सकता है।  पक्का महाल के नन्द साहू लेन- राम घाट गली में एक ऐसा मंदिर है जिसकी दीवारो से लेकर गर्भ ग्रह तक पंचकोशी परिक्रमा मार्ग पर स्थित सभी देवी देवताओ और तीर्थों की स्थापना की गयी है।  किसी ज़माने में जो लोग नंगे पैर इस लम्बी तीर्थ यात्रा को पूरी करने में समर्थ नहीं होते थे, वह इस मंदिर की परिक्रमा कर पंचकोशी यात्रा का फल प्राप्त करते थे ।  
पुरषोतम मास होने की वजह से चालू माह में यह परिक्रमा कालने के लिए हज़ारों श्रद्धालु सड़कों पर निकल पड़ते है जाने अनजाने हुए पापों से मुक्ति पाने के लिए पंचकोशी परिक्रमा की जाती है मणिकर्णिका चक्रपुष्करिणी तीर्थ में संकल्प लेकर शुरू की जाने वाली इस परिक्रमा के मार्ग पर पांच पांडव और १०८ तीर्थ है पक्का महाल के पंचकोशी मंदिर की दक्षिण दीवार पहले कर्दमेश्वर महादेव इसके बाद भीम चंडी की प्रतिमा स्थापित है इसके बाद पश्चिम दीवार पर रामेश्वर, उतरी दीवार पर पांचों पांडवा और कपिल धरा के स्थान है इन दीवारों पर हिन्दू देवी देवताओं के अलावा गृह नक्षत्रों के भी स्थान बनाये गए है मंदिर का पशिमी हिस्सा अयोध्या और पूर्वी भाग मथुरा के नाम से जाना जाता है दक्षिण भारत के राजा ब्रहमदेव द्वारा इस मदिर की स्थापना की गयी थी। 

Karkotak Nageshwar

Karkotak Nageshwar is located at nag kuan near Jaitpura Police Station.A person who bathes in Karkotak Well and worships Karkotak Nageshwar need not have fear of death due to any kind of poison.  No venom will be able to find way inside his body.It is worth mentioning here that Karkotak Nageshwar Ling is submerged in the water of Karkotak Well.When the water level recedes or the water is removed for cleaning purposes, the Ling becomes visible.  However, as long as the Ling remains submerged in the water, the water in the well attains divinity and people pray this well with all divinity.
However, at the main entrance just before going to the Nag Kuan, there is a temple, where one Shiv Ling has been installed which is worshiped as Nageshwar.






Gopal Mandir

During the early Mughal period the leading poet saint of Krishna devotion was Vallabhacharya (1479-1531), who at the age of 11 years came to Kashi for study. Later after completing pilgrimage to all the important sacred places in India, he finally settled down in Varanasi. While living in Varanasi at Jatanbar he propounded the philosophy of Shuddhadvaita, and wrote about 84 books. He was married in 1504, and his son Vitthalanatha was born in 1515 in Kashi. Vallabhacharya built a small temple of Krishna, which was renovated and expanded in 1730 by one of the great saints of the same line, Sri Gopal-Ji. The present structure of the temple was built in 1777 and named Gopala Mandir. Lying in Chaukhambha area, the Gopala Mandir is the patron seat of the Vallabha group of followers. Facing the main temple are the temples of Ranachoda-Ji, Baladeo-Ji and Dau-Ji. Nearby other temples are ones dedicated to Siddhda Durga and Vindu Madhava. === Description ===: On the 8th day of the dark fortnight of Bhadrapada (August-September) falls the birthday of Krishna (the 8th incarnation of Vishnu), which is celebrated in the Krishna related temples, most notably the Gopala Mandir. In the temple, on this occasion the main hall and stage display elaborate scenes of Krishna with his cowherd and milkmaid friends, with tiny cattle and trees, with toys and swings for his pleasure. Distribution of special prasada (sweets offered to god) to as many visitors as possible is popular. The day after Dipavali (first moon in the Karttika, October-November) is Annakuta (“the Mountain of Food”), associated with the legend of Krishna. Krishna is worshipped as Lord of Govardhana, the mountain he lifted up to protect the cowherd folk from the wrathful rains of Indra (king of the heaven). In a more elaborate form as in the temples of Vishvanatha and Annapurna, the Gopala Mandir, changed to the special place of decoration, celebration and offering of foodstuffs. At this temple 56 types of bhogas (edible offerings to the God) are offered, and 3-day festival is performed there.The Gopal Mandir Trust administers and managed the temple, consisting members from the priest families, followers, monastery and the senior citizens of Varanasi.


Police Line Janmashtami Celebration

People of the Holy City indulged in Janmashtami celebrations from Sunday. The colours of festivity were evident since Saturday with the emergence of several make-shift shops selling decorative items, toys, dresses for Lord Krishna, fruits and herbs.
As per the tradition many devotees observed fast on Sunday to mark the celebration of Lord Krishna's birth.
The beautifully decorate tableaux at police lines compound at Police Line were the major attraction for people,especially children.











Saturday, September 5, 2015

ललही छठ

यह व्रत भाद्रपद कृष्ण पक्ष षष्ठी को किया जाता है। इस दिन हल मूसल धारी श्री बलराम जी का जन्म हुआ था। कुछ लोग जनक नंदिनी माता सीता का भी जन्म दिवस इस तिथि को मानते हैं, बलराम जी के मुख्य शस्त्रों में हल और मूसल उल्लेखनीय है। इसी से इनका एक नाम हलधर भी है, इन्हीं के नाम के आधार पर इसका नाम हलषष्ठी पड़ा होगा। पुत्रवती स्त्रियां ही इस व्रत को करती हैं। इस दिन महुए की दातुन करने का विधान है। पारण के समय हल से जोता बोया गया अन्न नहीं खाना चाहिए इस कारण इस व्रत का सेवन करने वाली स्त्रियां नीवार (फरनहीं) का चावल सेवन करती हैं। इस दिन गाय का दूध भी वर्जित है। विधि.विधान में प्रातः सद्यः स्नाता की स्त्रियां भूमि (आंगन) लीपकर एक कुण्ड बनाती हैं। जिसमें बेरी, पलाश, गूलर, कुश, प्रभुत्ति टहनियां गाड़कर ललही की पूजा करती हैं। पूजन में सतनजा (गेहूं, चना, धान, मक्का, अरहर, ज्वार, बाजरे) आदि का भुना हुआ लावा चढ़ाया जाता है। हल्की से रंगा हुआ वस्त्र तथा कुछ सुहाग सामग्री भी चढ़ाई जाती है। पूजनोपरान्त निम्न मंत्र से प्रार्थना करनी चाहिए—
गंगा द्वारे कुशावर्ते विल्वके नील पर्वते।
स्नात्वा कनरवले देवि हर लब्धवती पतिम्।।
         अर्थात्— हे देवी ! आपने गंगा द्वारा कुशावर्त विल्वक नील पर्वत और कनखल तीर्थ में स्नान कर के भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त किया है। सुख और सौभाग्य देने वाली ललिता देवी आपको बार-बार नमस्कार है। आप मुझे अचल सुहाग दीजिए ऐसी प्रार्थना करें अन्त में शिवधाम की प्राप्ति होती है।

व्रत की कथा—
प्राचीन काल में एक ग्वालिन थी, जिसका प्रसव काल अत्यन्त सन्निकट था। एक ओर वह पीड़ा से व्याकुल थी तो दूसरी ओर उसका चित्त गोरस विक्रय में लगा था।
उसने विचार किया कि यदि बच्चा उत्पन्न हो गया तो फिर दूध दही ऐसे ही पड़ा रह जाएगा यह सोचकर वह झट उठी तथा सिर पर गोरस (दूध, दही) की मटकिया रखकर बेचने चल दी आगे चलकर कष्ट साध्य पीड़ा के कारण एक बनवेरी की ओट में बैठ गई और वहां उसके एक बालक पैदा हुआ। अल्हड़ ग्वालिन ने नवजात शिशु वही रखकर स्वयं दूध, दही बेचने समीपस्थ गांवों को चल दी। संयोग वश उस दिन हलषष्ठी भी थी। गाय भैंस का मिश्रित दूध होने पर भी उसने केवल भैंस का दूध बतलाकर ग्रामीणों को खूब ठगा। 

जिस बनवेरी में उसने बच्चे को छोड़ा था, उसी के समीप एक कृषक हल जोत रहा था। अकस्मात बैलों के भड़कने से चपेट में आकर वह बालक हल का फलक घुसने से मर गया यह घटना देखकर कृषक बहुत दुःखी तथा लाचार हुआ फिर भी उसने धैर्य धारण कर बनवेरी के कांटों से बच्चे के पेट पर टांका लगाकर घटना स्थल पर छोड़ दिया। तत्क्षण ग्वालिन भी विक्रय करके वहां आ गई। बच्चे की यह दशा देखकर उसने अपने ही किये पाप का प्रतिफल समझा फिर वह मन में सोचने लगी कि यदि मैंने हलषष्ठी के दिन दूध.दही विक्रय हेतु मिथ्या भाषण करके उन ग्रामीण नारियों का धर्म नष्ट न किया होता तो यह दशा क्यों होती इसलिए अब लौटकर सब बातें प्रकट कर प्रायश्चित करना होगा। ऐसा निश्चय कर वह उस गांव में गई जहां उसने दूध दही बेचा था वह गली.गली में घूमकर कहने लगी कि मेरा दूध गाय, भैंस का मिश्रण था। यह सुनकर स्त्रियों ने स्वधर्म रक्षार्थ उसे आशीर्वाद दिया बहुत सी युवतियों के द्वारा आशीष लेकर जब वह पुनः वन में आई तो उसका पुत्र जीवित मिला तभी से उसने स्वार्थ सिद्धि के लिए झूठ बोलना ब्रह्म हत्या के समान निकृष्ट कर्म समझकर छोड़ दिया। किन्हीं.किन्हीं प्रान्तों में ललही छठ.ललिता ब्रह्म के नाम से भी जाना जाता है। विधान उपरोक्त ही है।

Friday, September 4, 2015

कृष्ण जन्माष्टमी

जन्माष्टमी अर्थात कृष्ण जन्मोत्सव इस वर्ष जन्माष्टमी का त्यौहार 5 सितंबर 2015 को स्मार्तों का व्रत है और वैष्णव संप्रदाय के लोगों द्वारा मनाया जाएगा. जन्माष्टमी जिसके आगमन से पहले ही उसकी तैयारियां जोर शोर से आरंभ हो जाती है पूरे भारत वर्ष में इस त्यौहार का उत्साह देखने योग्य होता है. चारों का वातावरण भगवान श्री कृष्ण के रंग में डूबा हुआ होता है. जन्माष्टमी पूर्ण आस्था एवं श्रद्ध के साथ मनाया जाता है.
पौराणिक धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु के ने पृथ्वी को पापियों से मुक्त करने हेतु कृष्ण रुप में अवतार लिया, भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को रोहिणी नक्षत्र में देवकी और वासुदेव के पुत्ररूप में हुआ था. जन्माष्टमी को स्मार्त और वैष्णव संप्रदाय के लोग अपने अनुसार अलग-अलग ढंग से मनाते हैं. श्रीमद्भागवत को प्रमाण मानकर स्मार्त संप्रदाय के मानने वाले चंद्रोदय व्यापनी अष्टमी अर्थात रोहिणी नक्षत्र में जन्माष्टमी मनाते हैं तथा वैष्णव मानने वाले उदयकाल व्यापनी अष्टमी एवं उदयकाल रोहिणी नक्षत्र को जन्माष्टमी का त्यौहार मनाते हैं.
जन्माष्टमी के विभिन्न रंग रुप 
यह त्यौहार विभिन्न रुपों में मान्या जाता है कहीं रंगों की होली होती है तो कहीं फूलों और इत्र की सुगंन्ध का उत्सव होता तो कहीं दही हांडी फोड़ने का जोश और कहीं इस मौके पर भगवान कृष्ण के जीवन की मोहक छवियां देखने को मिलती हैं  मंदिरों को विशेष रुप से सजाया जाता है. भक्त इस अवसर पर व्रत एवं उपवास का पालन करते हैं इस दिन मंदिरों में झांकियां सजाई जाती हैं भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है तथा कृष्ण रासलीलाओं का आयोजन होता है.
जन्माष्टमी के शुभ अवसर समय भगवा कृष्ण के दर्शनों के लिएए दूर दूर से श्रद्धालु मथुरा पहुंचते हैं. श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर ब्रज कृष्णमय हो जाता है. मंदिरों को खास तौर पर सजाया जाता है. मथुरा के सभी मंदिरों को रंग-बिरंगी लाइटों व फूलों से सजाया जाता है. मथुरा में जन्माष्टमी पर आयोजित होने वाले श्रीकृष्ण जन्मोत्सव को देखने के लिए देश से ही नहीं बल्कि विदेशों से लाखों की संख्या में कृष्ण भक्त पंहुचते हैं  भगवान के विग्रह पर हल्दी, दही, घी, तेल, गुलाबजल, मक्खन, केसर, कपूर आदि चढाकर लोग उसका एक दूसरे पर छिडकाव करते हैं. इस दिन मंदिरों में झांकियां सजाई जाती है तथा भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है और रासलीला का आयोजन किया जाता है.
जन्माष्टमी व्रत पूजा विधि
शास्त्रों के अनुसार इस दिन व्रत का पालन करने से भक्त को मोक्ष की प्राप्ति होती है यह व्रत कामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है. श्री कृष्ण जी की पूजा आराधना का यह पावन पर्व सभी को कृष्ण भक्ति से परिपूर्ण कर देता है. इस दिन व्रत-उपवास करने का विधान है. यह व्रत सनातन-धर्मावलंबियों के लिए अनिवार्य माना जाता है. इस दिन उपवास रखे जाते हैं तथा कृष्ण भक्ति के गीतों का श्रवण किया जाता है. घर के पूजागृह तथा मंदिरों में श्रीकृष्ण-लीला की झांकियां सजाई जाती हैं. जन्माष्टमी पर्व के दिन प्रात:काल उठ कर नित्य कर्मों से निवृत्त होकर पवित्र नदियों में, पोखरों में या घर पर ही स्नान इत्यादि करके जन्माष्टमी व्रत का संकल्प लिया जाता है.
पंचामृत व गंगा जल से माता देवकी और भगवान श्रीकृष्ण की सोने, चांदी, तांबा, पीतल, मिट्टी की मूर्ति या चित्र पालने में स्थापित करते हैं तथा भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति नए वस्त्र धारण कराते हैं. बालगोपाल की प्रतिमा को पालने में बिठाते हैं तथा सोलह उपचारों से भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करते है. पूजन में देवकी, वासुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी आदि के नामों का उच्चारण करते हैं तथा उनकी मूर्तियां भी स्थापित करके पूजन करते हैं. भगवान श्रीकृष्ण को शंख में जल भरकर, कुश, फूल, गंध डालकर अर्घ्य देते हैं. पंचामृत में तुलसी डालकर व माखन मिश्री का भोग लगाते हैं.
रात्रि समय भागवद्गीता का पाठ तथा कृष्ण लीला का श्रवण एवं मनन करना चाहिए. भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति अथवा शालिग्राम का दूध, दही, शहद, यमुना जल आदि से अभिषेक किया जाता है तथा भगवान श्री कृष्ण जी का षोडशोपचार विधि से पूजन किया जाता है. भगवान का श्रृंगार करके उन्हें झूला झुलाया जाता है. श्रद्धालु भक्त मध्यरात्रि तक पूर्ण उपवास रखते हैं. जन्माष्टमी की रात्रि में जागरण, कीर्तन किए जाते हैं व अर्धरात्रि के समय शंख तथा घंटों के नाद से श्रीकृष्ण-जन्मोत्सव को संपन्न किया जाता है.