Sunday, April 19, 2015

अक्षय तृतीया

अक्षय तृतीया पर्व को कई नामों से जाना जाता है. इसे अखतीज और वैशाख तीज भी कहा जाता है. इस वर्ष यह पर्व 21 अप्रैल 2015  के दिन मनाया जाएगा. इस पर्व को भारतवर्ष के खास त्यौहारों की श्रेणी में रखा जाता है. अक्षय तृतीया पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन मनाया जाता है. इस दिन स्नान, दान, जप, होम आदि अपने सामर्थ्य के अनुसार जितना भी किया जाएं, अक्षय रुप में प्राप्त होता है.
अक्षय तृतीया कई मायनों से बहुत ही महत्वपूर्ण समय होता है. इस दिन के साथ बहुत सारी कथाएं ओर किवदंतीया जुडी हुई हैं. ग्रीष्म ऋतु का आगमन, खेतों में फसलों का पकना और उस खुशि को मनाते खेतीहर व ग्रामीण लोग विभिन्न व्रत, पर्वों के साथ इस तिथि का पदार्पण होता है. धर्म की रक्षा हेतु भगवान श्री विष्णु के तीन शुभ रुपों का वतरण भी इसी अक्षय तृतीया के दिन ही हुए माने जाते हैं.
माना जाता है कि जिनके अटके हुए काम नहीं बन पाते हैं,या व्यापार में लगातार घाटा हो रहा है अथवा किसी कार्य के लिए कोई शुभ मुहुर्त नहीं मिल पा रह अहोतो उनके लिए कोई भी नई शुरुआत करने के लिए अक्षय तृतीया का दिन बेहद शुभ माना जाता है.  अक्षय तृतीया में सोना खरीदना बहुत शुभ माना गया है. इस दिन स्वर्णादि आभूषणों की ख़रीद-फरोख्त को भाग्य की शुभता से जोडा़ जाता है.

अक्षय तृतीया का पौराणिक महत्व
इस पर्व से अनेक पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं. इसके साथ महाभारत के दौरान पांडवों के भगवान श्रीकृष्ण से अक्षय पात्र लेने का उल्लेख आता है. इस दिन सुदामा और कुलेचा भगवान श्री कृष्ण के पास मुट्ठी - भर भुने चावल प्राप्त करते हैं. इस तिथि में भगवान के नर-नारायण, परशुराम, हयग्रीव रुप में अवतरित हुए थे. इसलिये इस दिन इन अवतारों की जयन्तियां मानकर इस दिन को उत्सव रुप में मनाया जाता है. एक पौराणिक मान्यता के अनुसार त्रेता युग की शुरुआत भी इसी दिन से हुई थी. इसी कारण से यह तिथि युग तिथि भी कहलाती है.
अक्षय तृतीया तिथि के दिन अगर दोपहर तक दूज रहे, तब भी अक्षय तृतीया इसी दिन मनाई जाती है. इस दिन सोमवार व रोहिणी नक्षत्र हो तो बहुत उत्तम है. जयन्तियों का उत्सव मनाना और पूजन इत्यादि कराना हों, तो विद्वान पंडित से कराएं. इसी दिन प्रसिद्ध तीर्थस्थल बद्रीनारायण के कपाट भी खुलते हैं.  वृन्दावन स्थित श्री बांके बिहारी जी के मन्दिर में केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं, अन्यथा वे पूरे वर्ष वस्त्रों से ढके रहते हैं.

अक्षय तृतीया में दान पुण्य का महत्व
अक्षय तृतीया में पूजा, जप-तप, दान स्नानादि शुभ कार्यों का विशेष महत्व तथा फल रहता है. इस दिन गंगा इत्यादि पवित्र नदियों और तीर्थों में स्नान करने का विशेष फल प्राप्त होता है. यज्ञ, होम, देव-पितृ तर्पण, जप, दान आदि कर्म करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है.
अक्षय तृ्तिया के दिन गर्मी की ऋतु में खाने-पीने, पहनने आदि के काम आने वाली और गर्मी को शान्त करने वाली सभी वस्तुओं का दान करना शुभ होता है. इस्के अतिरिक्त इस दिन जौ, गेहूं, चने, दही, चावल, खिचडी, ईश (गन्ना) का रस, ठण्डाई व दूध से बने हुए पदार्थ, सोना, कपडे, जल का घडा आदि दें. इस दिन पार्वती जी का पूजन भी करना शुभ रहता है.

अक्षत तृतीया व्रत एवं पूजा
अक्षय तृ्तीया का यह उतम दिन उपवास के लिए भी उतम माना गया है. इस दिन को व्रत-उत्सव और त्यौहार तीनों ही श्रेणी में शामिल किया जाता है. इसलिए इस दिन जो भी धर्म कार्य किए वे उतने ही उतम रहते है.
इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान इत्यादि नित्य कर्मों से निवृत होकर व्रत या उपवास का संकल्प करें. पूजा स्थान पर विष्णु भगवान की मूर्ति या चित्र स्थापित कर पूजन आरंभ करें भगवान विष्णु को पंचामृत से स्नान कराएं, तत्पश्चात उन्हें चंदन, पुष्पमाला अर्पित करें.
पूजा में में जौ या जौ का सत्तू, चावल, ककडी और चने की दाल अर्पित करें तथा इनसे भगवान विष्णु की पूजा करें. इसके साथ ही विष्णु की कथा एवं उनके विष्णु सस्त्रनाम का पाठ करें.  पूजा समाप्त होने के पश्चात भगवान को भोग लाएं ओर प्रसाद को सभी भक्त जनों में बांटे और स्वयं भी ग्रहण करें. सुख शांति तथा सौभाग्य समृद्धि हेतु इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती जी का पूजन भी किया जाता है.
लोकाचारे में इस दिन चावल, मूंग की खिचडी खाने का बडा रिवाज है. यह व्यंजन बनाने के लिये इमली के फल और गुड को अलग-2 भिगो दिया जाता है. और अच्छी तरह भीग जाने पर दोनों का रस बनाकर छान लेते है. इमली के बराबर का गुड मिलाया जाता है. इस दिन खेती करने वाले आने वाले वर्ष में खेती कैसी रहेगी. इसके कई तरह के शकुन निकालते है. इस दिन को नवन्न पर्व भी कहते हैं, इसलिए इस दिन बरतन, पात्र, मिष्ठान्न, तरबूजा, खरबूजा दूध दही चावल का दान भी किया जाता है

अक्षय तृतीया अभिजीत मुहुर्त 
धर्म शास्त्रों में इस पुण्य शुभ पर्व की कथाओं के बारे में बहुत कुछ विस्तार पूर्वक कहा गया है. इनके अनुसार यह दिन सौभाग्य और संपन्नता का सूचक होता है. दशहरा, धनतेरस, देवउठान एकादशी की तरह  अक्षय तृतीया  को अभिजीत, अबूझ मुहुर्त या सर्वसिद्धि मुहूर्त भी कहा जाता है. क्योंकि इस दिन किसी भी शुभ कार्य करने हेतु पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती. अर्थात इस दिन किसी भी शुभ काम को करने के लिए आपको मुहूर्त निकलवाने की आवश्यकता  नहीं होती. अक्षय अर्थात कभी कम ना होना वाला इसलिए मान्यता अनुसार इस दिन किए गए कार्यों में शुभता प्राप्त होती है. भविष्य में उसके शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं.
पूरे भारत वर्ष में अक्षय तृतीया की खासी धूम रहती है. हए कोई इस शुभ मुहुर्त के इंतजार में रहता है ताकी इस समय किया गया कार्य उसके लिए अच्छे फल लेकर आए. मान्यता है कि इस दिन होने वाले काम का कभी क्षय नहीं होता अर्थात इस दिन किया जाने वाला कार्य कभी अशुभ फल देने वाला नहीं होता. इसलिए किसी भी नए कार्य की शुरुआत से लेकर महत्वपूर्ण चीजों की खरीदारी व विवाह जैसे कार्य भी इस दिन बेहिचक किए जाते हैं.
नया वाहन लेना या गृह प्रेवेश करना, आभूषण खरीदना इत्यादि जैसे कार्यों के लिए तो लोग इस तिथि का विशेष उपयोग करते हैं. मान्यता है कि यह दिन सभी का जीवन में अच्छे भाग्य और सफलता को लाता है. इसलिए लोग जमीन जायदाद संबंधी कार्य, शेयर मार्केट में निवेश रीयल एस्टेट के सौदे या कोई नया बिजनेस शुरू करने जैसे काम भी लोग इसी दिन करने की चाह रखते हैं.

अक्षय तृतीया महत्व 
वैशाख शुक्ल पक्ष की तृ्तिया को अक्षय तृ्तिया के नाम से पुकारा जाता है इस तिथि के दिन महर्षि गुरु परशुराम का जन्म दिन होने के कारण इसे "परशुराम तीज" या "परशुराम जयंती" भी कहा जाता है. इस दिन गंगा स्नान का बडा भारी महत्व है. इस दिन स्वर्गीय आत्माओं की प्रसन्नाता के लिए कलश, पंखा, खडाऊँ, छाता,सत्तू, ककडी, खरबूजा आदि फल, शक्कर आदि पदार्थ ब्राह्माण को दान करने चाहिए. उसी दिन चारों धामों में श्री बद्रीनाथ नारायण धाम के पाट खुलते है. इस दिन भक्तजनों को श्री बद्री नारायण जी का चित्र सिंहासन पर रख के मिश्री तथा चने की भीगी दाल से भोग लगाना चाहिए. भारत में सभी शुभ कार्य मुहुर्त समय के अनुसार करने का प्रचलन है अत: इस जैसे अनेकों महत्वपूर्ण कार्यों के लिए इस शुभ तिथि का चयन किया जाता है, जिसे अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है.


Monday, April 13, 2015

संकट मोचन मन्दिर


काशी प्रवास के दौरान रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने आराध्य हनुमान जी के कई मंदिरों की स्थापना की। उनके द्वारा स्थापित हनुमान मंदिरों में से एक संकटमोचन मंदिर भक्ति की शक्ति का अदभुत प्रमाण देता है। इस मंदिर में स्थापित मूर्ति को देखकर ऐसा आभास होता है जेसै साक्षात हनुमान जी विराजमान हैं। मान्यता के अनुसार तुलसीघाट पर स्थित पीपल के पेड़ पर रहने वाले पिचास से एक दिन तुलसीदास का सामना हो गया। उस पिचाश ने तुलसीदास को हनुमानघाट पर होने वाले रामकथा में श्रोता के रूप में प्रतिदिन आने वाले कुष्ठी ब्राह्मण के बारे में बताया। इसके बाद तुलसीदास जी प्रतिदिन उस ब्राह्मण का पीछा करने लगे। अन्ततः एक दिन उस ब्राह्मण ने तुलसीदास जी को अपना दर्शन हनुमान जी के रूप में दिया। जिस स्थान पर तुलसीदास जी को हनुमान जी का दर्शन हुआ था उसी जगह उन्होंने हनुमान जी की मूर्ति स्थापित कर संकटमोचन का नाम दिया। साढ़े आठ एकड़ भूमि पर फैला संकटमोचन मंदिर परिसर हरे-भरे वृक्षों से आच्छादित है। दुर्गाकुण्ड से लंका जाने वाले मार्ग पर करीब 3 सौ मीटर आगे बढ़ने पर दाहिनी ओर कुछ कदम की दूरी पर ही मंदिर का विशाल मुख्य द्वार है। मुख्य द्वार से मंदिर का फासला करीब 50 मीटर का है। मुख्य मंदिर में हनुमान जी की सिन्दूरी रंग की अद्वितीय मूर्ति स्थापित है। माना जाता है कि यह हनुमान जी की जागृत मूर्ति है। गर्भगृह की दीवारों पर लिपटे सिन्दूर को लोग अपने माथे पर प्रसाद स्वरूप लगाते हैं। गर्भगृह में ही दीवार पर नरसिंह भगवान की मूर्ति स्थापित है। हनुमान मंदिर के ठीक सामने एक कुंआ भी है जिसके पीछे राम जानकी का मंदिर है। श्रद्धालु हनुमान जी के दर्शन के उपरांत राम जानकी का भी आशीर्वाद लेते हैं। वहीं एक तरफ शिव मंदिर है। इस भव्य और बड़े हनुमान मंदिर में अतिथिगृह भी है जिसमें मंदिर में होने वाले तमाम सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रमों में भाग लेने आये अतिथि विश्राम करते हैं। हनुमान जी के मंदिर के पीछे हवन कुण्ड है जहां श्रद्धालु पूजा पाठ करते हैं। शहर के दक्षिणी छोर पर स्थित इस मंदिर में बंदरों की बहुतायत संख्या है। पूरे मंदिर में बंदर इधर-उधर उछल कूद करते रहते हैं। कभी-कभी तो ये बंदर दर्शनार्थियों के पास आकर उनसे प्रसाद भी ले लेते हैं। हालांकि झुंड में रहने वाले ये बंदर किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते। मंदिर में हनुमान जी की पूजा नियत समय पर प्रतिदिन आयोजित होती है। पट खुलने के साथ ही आरती भोर में 4 बजे घण्ट-घड़ियाल नगाड़ों और हनुमान चालीसा के साथ होती है जबकि संध्या आरती रात नौ बजे सम्पन्न होती है। आरती की खास बात यह है कि सबसे पहले मंदिर में स्थापित नरसिंह भगवान की आरती होती है। मौसम के अनुसार आरती के समय में आमूलचूल परिवर्तन भी हो जाता है। दिन में 12 से 3 बजे तक मंदिर का कपाट बंद रहता है। आरती के दौरान पूरा मंदिर परिसर हनुमान चालीसा से गूंज उठता है। हनुमान जी के प्रति श्रद्धा से ओत-प्रोत भक्त जमकर जयकारे लगाते हैं। वहीं मंगलवार और शनिवार को तो मंदिर दर्शनार्थियों से पट जाता है। इस दिन शहर के अलावा दूर-दूर से दर्शनार्थी संकटमोचन दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। माहौल पूरी तरह से हनुमानमय हो जाता है। कोई हाथ में हनुमान चालीसा की किताब लेकर उसका वाचन करता है तो कुछ लोग मंडली में ढोल-मजीरे के साथ सस्वर सुन्दरकांड का पाठ करते नजर आते हैं। बहुत से भक्त साथ में सिन्दूर और तिल का तेल भी हनुमान जी को चढ़ाने के लिए पहुंचते हैं। इस तरह मंदिर में हमेशा भक्तों की आवाजाही का सिलसिला लगा रहता है। वैसे यहां होने वाले कार्यक्रमों की बात की जाये तो सालभर कुछ न कुछ बड़े आयोजन होते रहते हैं लेकिन हनुमान जयंती, राम जयंती और सावन महीने में मंदिर में होने वाले कार्यक्रमों की बात ही निराली है। मंदिर में हर साल अप्रैल महीने में हनुमान जयंती मनायी जाती है। जयंती के अवसर पर हनुमान जी की भव्य झांकी सजायी जाती है। साथ ही इस मौके पर होने वाला पांच दिवसीय संकटमोचन संगीत समारोह तो काफी प्रसिद्ध है। यह कार्यक्रम विशुद्ध रूप से शास्त्रीय संगीत का होता है। इन पांच दिनों में शास्त्रीय संगीत की स्वरलहरियों से पूरा मंदिर परिसर झंकृत हो उठता है। आलम यह रहता है कि इस पांच दिवसीय कार्यक्रम में संगीत सरिता की शुरूआत प्रतिदिन गोधुली बेला 7 बजे से होती है। इसके बाद तो जैसे-जैसे रात गंभीर होती जाती है शास्त्रीय संगीत परत दर परत लोगों के बीच घुलने लगती है और कार्यक्रम प्रत्युष बेला तक चलता रहता है। शास्त्रीय संगीत की तीनों विधा यानी गायन, वादन और नृत्य की बेहतरीन प्रस्तुति होती है। कई दशकों से चल रहे इस कार्यक्रम में देश और विदेश के ख्यातिलब्ध संगीत साधकों ने अपनी कला को हनुमान जी को समर्पित किया है। कई कलाकार तो वर्षों से लगातार इस संगीत के महाउत्सव में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं। गायन में पंडित जसराज, पंडित राजन साजन मिश्र, पंडित छन्नूलाल मिश्र, साध्वी सुनंदा पटनायक, कंकणा बनर्जी, अजय चक्रवर्ती, देवाशीष डे, विश्वजीत पोहनकर जैसे गायक प्रस्तुति देते हैं। वादन विधा के सरोद में अमजद अली खां और उनके पुत्र अमानअली व अयानअली तबला में पंडित किशन जी महराज, पंडित पूरन महराज सहित बनारस घराने के कलाकर अपनी प्रस्तुति देते रहे हैं। संतूर में शिवकुमार शर्मा व उनके पुत्र राहुल शर्मा, भजन सपोरी व उनके पुत्र अभय रूस्तम सपोरी हर वर्ष संतूर से हनुमान जी का आशीर्वाद लेते रहे हैं। वहीं, बासुरी में पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, राकेश चौरसिया, रोनू मजूमदार अपनी तान छेड़ते रहे हैं। वहीं नृत्य के भारतीय प्रसिद्ध विधा कत्थक, भरतनाट्यम, ओडिसी की प्रस्तुति के दौरान भारत के प्रसिद्ध नृत्यांगनों के पैर मंदिर परिसर में थिरकते हैं। जिसमें केलूचरण महापात्रा की परंपरा में रविकांत एवं सुजाता महापात्रा, अपूर्वा झा, डोना गांगुली सहित अन्य नृत्यांगनाओं से मंदिर परिसर गुलजार हो जाता है। इस संगीत समारोह की खास बात यह है कि इसमें प्रस्तुति देने वाले कलाकर बिना शुल्क हनुमान जी को अपनी साधना समर्पित करते हैं। इसके अलावा मण्डलियों द्वारा सुन्दरकाण्ड पाठ तो होता ही है 24 घण्टे का सीताराम अखण्ड कीर्तन भी किया जाता है। वैसे तो सावन के महीने में शिव की इस नगरी में हर तरफ मेले जैसा नजारा होता है। इस दौरान पूरे महीने संकटमोचन मंदिर के आस-पास भी मेला लगा रहता है। वहीं सावन के अंतिम दो मंगलवार को हनुमान जी का अलौकिक श्रृंगार किया जाता है। इसी महीने में कृष्ण तृतीया को गोस्वामी तुलसीदास की पुण्यतिथि मनायी जाती है। जिसमें काफी संख्या में ब्राह्मणों, साधु, संतों मंदिर में भोजन करते हैं। कार्तिक महीने में एक और बड़ा आयोजन नरकासुर पर हनुमान विजय के उपलक्ष्य में झांकी सजा कर होता है। मंदिर में राम-विवाह का आयोजन भी हर्षोल्लास के साथ होता है। इस दौरान विभिन्न कार्यक्रम मंदिर में होते हैं। मंदिर में मानस नवाह पाठ होता है जिसे 111 ब्राह्मणों द्वारा सम्पन्न कराया जाता है। हनुमान जी का श्रृंगार भी होता है। अन्त में दो दिन का भजन सम्मेलन भी होता है। इस भजन सम्मेलन में काफी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर के वर्तमान महंत प्रो0 विश्वमभरनाथ मिश्र हैं। इनके पिता स्व0 प्रो0 वीरभद्र मिश्र भी मंदिर के महंत रह चुके हैं। मंदिर के महंतों की कड़ी में महंत जयकृष्ण, महंत तुलाराम, महंत धनीराम, महंत पीताम्बर दास, महंत लक्ष्मी नारायण, महंत विन्ध्येश्वरी प्रसाद, महंत राधेश्याम, महंत गिरिधारी दास, महंत तुलसी राम, महंत स्वामीनाथ, महंत बांके राम भी महंत पद पर रह चुके हैं। इस मंदिर की खासियत यह है कि यहां बाहर से प्रसाद चढ़ाने के लिए नहीं लेकर आना पड़ता है। मंदिर परिसर में ही देशी घी के लड्डू और पेड़ा की दुकान है। जहां श्रद्धालु रसीद कटवाकर प्रसाद लेते हैं। यहां के लड्डू का प्रसाद तो बहुत प्रसिद्ध है। इसकी विशिष्टता यह है कि कई दिनों बाद भी प्रसाद खराब नहीं होता है। मंदिर में आम दर्शनार्थियों की सुविधाओं के लिए भी कई इंतजाम किये गये हैं। मसलन वाहन पार्किंग के लिए स्टैंड और मोबाइल, जूता, चप्पल रखने की निशुल्क व्यवस्था की गयी है।



Friday, April 3, 2015

हनुमान जयंती

भगवान शिव के आठ रूद्रावतारों में एक हैं हनुमान जी। मान्यता है कि नरक चतुर्दशी यानी कार्तिक कृष्ण चतुदर्शी के दिन हनुमान जी का जन्म हुआ था। भगवान राम त्रेतायुग में धर्म की स्थापना करके पृथ्वी से अपने लोक बैकुण्ठ चले गये लेकिन धर्म की रक्षा के लिए हनुमान को अमरता का वरदान दिया। इस वरदान के कारण हनुमान जी आज भी जीवित हैं और भगवान के भक्तों और धर्म की रक्षा में लगे हुए हैं। 
हनुमान जी के जीवित होने के प्रमाण समय-समय पर प्राप्त होते रहें जो इस बात को प्रमाणित करता है कि हनुमान जी आज भी जीवित हैं। 16वी सदी के महान संत कवि तुलसीदास जी को हनुमान की कृपा से राम जी के दर्शन प्राप्त हुए। कथा है कि हनुमान जी ने तुलसीदास जी से कहा था कि राम और लक्ष्मण चित्रकूट नियमित आते रहते हैं। मैं वृक्ष पर तोता बनकर बैठा रहूंगा जब राम और लक्ष्मण आएंगे मैं आपको संकेत दे दूंगा। 
हनुमान जी की आज्ञा के अनुसार तुलसीदास जी चित्रकूट घाट पर बैठ गये और सभी आने जाने वालों को चंदन लगाने लगे। राम और लक्ष्मण जब आये तो हनुमान जी गाने लगे 'चित्रकूट के घाट पै, भई संतन के भीर। तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुबीर।।' हनुमान के यह वचन सुनते ही तुलसीदास प्रभु राम और लक्ष्मण को निहारने लगे।' इस प्रकार तुलसीदा को राम जी के दर्शन हुए। 
तुलसीदास की बढ़ती हुई कीर्ति से प्रभावित होकर अकबर ने एक बार तुलसीदास जी को अपने दरबार में बुलाया। तुलसीदास जी को अकबर ने कोई चमत्कार दिखाने के लिए कहा, जिसे तुलसीदास जी ने अस्वीकार कर दिया। क्रोधित होकर अकबर ने तुलसीदास को जेल में डाल दिया। जेल में तुलसीदास जी ने हनुमान की अराधना शुरू कर दी। 
इतने में चमत्कार यह हुआ कि बंदरों ने अकबर के महल पर आक्रमण कर दिया। बंदरों के उत्पात से अकबर भयभीत हो गया। अकबर को समझ में आ गया कि तुलसीदास जी को जेल में डालने के कारण हनुमान जी नाराज हो गये हैं। बंदरों के उत्पात का कारण यही है। अकबर ने संत तुलसीदास जी से क्षमा मांगी और उन्हें जेल से मुक्त कर दिया। 
तुलसीदास जी से पहले हनुमान जी की मुलाकात त्रेतायुग में महाभारत युद्घ से पहले पाण्डु पुत्र भीम से हुई थी। भीम की विनती पर युद्घ के समय हनुमान जी ने पाण्डवों की सहायता करने का आश्वासन दिया था। माना जाता है कि महाभारत युद्घ के समय अर्जुन के रथ का ध्वज थाम कर महावीर हनुमान बैठे थे। इसी कारण तीखे वाणों से भी अर्जुन का रथ पीछे नहीं होता था और संपूर्ण युद्घ के दौरान अर्जुन के रथ का ध्वज लहराता रहा। 
शास्त्रों का ऐसा मत है कि जहां भी राम कथा होती है वहां हनुमान जी अवश्य होते हैं। इसलिए हनुमान की कृपा पाने के लिए श्री राम की भक्ति जरूरी है। जो राम के भक्त हैं हनुमान उनकी सदैव रक्षा करते हैं। 
15 साल बाद चंद्रग्रहण और हनुमान जयंती का शुभ संयोग
वर्ष 2015 में चैत्र पूर्णिमा पर 15 साल बाद खग्रास चंद्रग्रहण पड़ रहा है तथा उस दिन हनुमान जयंती भी है। शनिवार दिनांक 04.04.15 को चैत्र मास की पूर्णिमा तिथि है साथ-साथ इस दिन पड़ रहा है अशुभ चंद्रग्रहण। चंद्र ग्रहण का सूतक शनिवार दिनांक 04.04.15 को प्रातः 03 बजकर 46 मिनट से शुरू हो जाएगा। जो कि पूरे दिन रहेगा तथा शाम को 7 बजकर 15 मिनट पर चंद्र ग्रहण समाप्त होगा। सूतक लगने के साथ हनुमान मंदिरों में पट बंद कर दिए जाएंगे।
शास्त्रानुसार चंद्र ग्रहण के दौरान देव दर्शन, मूर्ति को स्पर्श करना, खाना पीना एवं शुभकार्य पर पूरी तरह से प्रतिबंध लग जाएगा। ऐसे में प्रशन यह उठता है कि किस प्रकार हनुमान जयंती का उत्सव मनाया जाए।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पूर्णिमा तिथि शुक्रवार दिनांक 03.04.15 शाम 03 बजकर 21 मिनट से प्रारंभ होकर शनिवार दिनांक 04.04.15 शाम 05 बजकर 35 मिनट तक विद्यमान रहेगी तथा हस्त नक्षत्र दिनांक 03.04.15 रात 08 बजकर 50 मिनट से प्रारंभ होकर शनिवार दिनांक 04.04.15 रात 11 बजकर 35 मिनट तकविद्यमान रहेगा।
ऐसे में हनुमान जयंती का पर्व ग्रहण काल के सूतक से बचकर दो दानों तक मनाया जा सकता है। हनुमान जयंती मनाने का पहला अवसर शुक्रवार दिनांक 03.04.15 शाम 03 बजकर 21 से शनिवार दिनांक 04.04.15 को प्रातः 03 बजकर 45 मिनट तक रहेगा तथा दूसरा अवसर शनिवार दिनांक 04.04.15 शाम 7 बजकर 15 मिनट से प्रारंभ होकर शनिवार दिनांक 04.04.15 रात 11 बजकर 35 मिनट तक रहेगा।
ऐसे में जो लोग पूर्णिमा और हस्त नक्षत्र के मेल से शुभ समय में हनुमान जयंती मनाना चाहते हैं उनके लिए शुक्रवार दिनांक 03.04.15 की रात 09 बजे से रात 10 बजकर 30 मिनट के बीच लाभ के चौघड़िया में हनुमान जयंती श्रेष्ठ रूप से मनाई जाएगी।


Thursday, April 2, 2015

गुड फ्राइडे

गुड फ्राइडे के दिन ईसाई धर्म को मानने वाले अनुयायी गिरजाघर जाकर प्रभु यीशु को याद करते हैं. ईसा मसीह के जन्म क्रिसमस का आनंद मनाने के कुछ ही दिन बाद ईसाई तपस्या, प्रायश्चित्त और उपवास का समय मनाते हैं. यह समय जो 'ऐश वेडनस्डे' से शुरू होकर 'गुड फ्राइडे' को खत्म होता है, 'लेंट' कहलाता है. जिस सलीब क्रॉस पर ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया गया था उसके प्रतीक रूप में आस्थावानों की श्रद्धा स्वरूप लकड़ी का एक तख्ता गिरजाघरों में रखा जाता है. ईसा के अनुयायी एक-एक कर आकर उसे चूमते हैं.
तत्पश्चात समारोह में प्रवचन, ध्यान और प्रार्थनाएँ की जाती हैं. इस दौरान श्रद्धालु प्रभु यीशु द्वारा तीन घंटे तक क्रॉस पर भोगी गई पीड़ा को याद करते हैं. रात के समय कहीं-कहीं काले वस्त्र पहनकर श्रद्धालु यीशु की छवि लेकर मातम मनाते हुए एक चल समारोह निकालते हैं और प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार भी किया जाता है. चूँकि गुड फ्राइडे प्रायश्चित्त और प्रार्थना का दिन है अतः इस दिन गिरजाघरों में घंटियां नहीं बजाई जातीं.
गुड फ्राइडे को होली फ्राइडे, ब्लैक फ्राइडे और ग्रेट फ्राइडे भी कहते हैं. यह त्यौहार ईसाई धर्म के लोगों द्वारा कैलवरी में ईसा मसीह को सलीब पर चढ़ाने के कारण हुई मृत्यु के उपलक्ष्य में मनाया है. यह त्यौहार पवित्र सप्ताह के दौरान मनाया जाता है, जो ईस्टर सन्डे से पहले पड़ने वाले शुक्रवार को आता है और इसका पालन पाश्कल ट्रीडम के अंश के तौर पर किया जाता है और यह अक्सर यहूदियों के पासोवर के साथ पड़ता है.
ईसा के पुनरुत्थान के तीन दिन पूर्व पड़ने वाले शुक्रवार को गुड फ्राइडे के रूप में मनाया जाता है. इस दिन भक्तगण उपवास के साथ प्रार्थना और मनन करते हैं. चर्च एवं घरों से सजावट की वस्तुएं हटा ली जाती हैं या उन्हें कपडे़ से ढक दिया जाता है. गुड फ्राइडे की तैयारी प्रार्थना और उपवास के रूप में चालीस दिन पहले ही प्रारम्भ हो जाती है. इस दौरान शाकाहारी और सात्विक भोजन पर जोर दिया जाता है. गुड फ्राइडे के दिन ईसा के अन्तिम सात वाक्यों की विशेष व्याख्या की जाती है जो क्षमा, मेल-मिलाप, सहायता और त्याग पर केन्द्रित हैं.
बाइबिल में उल्लेख है कि एक विद्वान ने ईसा से पूछा, गुरुवर, अनन्त जीवन प्राप्त करने के लिए मुझे क्या करना होगा? ईसा ने उससे कहा, ईश्वर को अपने हृदय, आत्मा और सारी शक्ति से प्यार करो और अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो. तब उस व्यक्ति ने एक और प्रश्न किया, लेकिन मेरा पड़ोसी कौन है? ईसा ने कहा, किसी भी समय वह जरूरतमंद और लाचार व्यक्ति जो तुम्हारे सामने है, वही तुम्हारा पड़ोसी है.
कैसे मनाया जाता है गुड फ्राइडे
रोमन कैथोलिक चर्च गुड फ्राइडे को उपवास दिवस के तौर पर मानता है, जबकि चर्च के लैटिन संस्कारों के अनुसार एक बार पूरा भोजन हालांकि वह नियमित भोजन से कम होता है और अक्सर उसमें मांस के बदले मछली खायी जाती है और दो कलेवा यानी अल्पाहार लिया जाता है.
रोमन रीति के अनुसार सामान्यतः पवित्र बृहस्पतिवार की शाम को प्रभु के भोज के उपरांत कोई मास उत्सव नहीं होता जब तक कि ईस्टर निगरानी की अवधि बीत न जाये. प्रभु ईसा मसीह के स्मरण में भोज का कोई उत्सव नहीं होता और वह केवल पस्सिओं ऑफ़ द लोर्ड के सर्विस के दौरान भक्तों में वितरित किया जाता है.
पूजा वेदी पूरी तरह से खाली रहती है और क्रॉस, मोमबत्ती अथवा वस्त्र कुछ भी वहां नहीं रहता. प्रथा के अनुसार ईस्टर निगरानी अवधि में जल का आशीर्वाद पाने के लिए पवित्र जल संस्कार के पात्र खाली किये जाते हैं. ईस्टर निगरानी की अवधि के दौरान गुड फ्राइडे अथवा पवित्र शनिवार को घंटियाँ नहीं बजाने की परम्परा है.
पैशन ऑफ़ द लॉर्ड के उत्सव का आदर्श समय अपराह्न तीन बजे है. इस समय पादरी के पहनावे का रंग लाल होता है. उन्नीस सौ सत्तर से पहले पहनावे का रंग काला होता था, केवल कम्यूनियन वाला हिस्सा बैगनी रंग का होता था. उन्नीस सौ पचपन से पहले पूरा पहनावा ही काला होने का विधान था. अगर कोई बिशप यह अनुष्ठान संपन्न करता है, वह एक सादा मुकुट पहनता है. प्रार्थना के तीन भाग होते हैं- बाइबल और धर्म ग्रंथों का पाठ, क्रॉस की पूजा और प्रभु भोज में सहभागिता.
बाइबल पाठ के पहले भाग में प्रभु यीशू के प्रति प्रेम और गुणगान की आवृत्ति या गायन होता है जो अक्सर एक से अधिक पाठकों या गायकों द्वारा किया जाता है. इस प्रथम चरण में प्रार्थना की एक श्रृंखला होती है जो चर्च, पोप, पादरी और चर्च में आने वाले गृहस्थों, प्रभु यीशु मसीह में विश्वास नहीं करने वालों, भगवान पर विश्वास नहीं करने वालों, सार्वजनिक कार्यालयों में काम करने वालों और विशेष तौर पर जरूरतमंद लोगों के लिए की जाती है.
गुड फ्राइडे के त्यौहार के दूसरे चरण में क्रॉस की पूजा की जाती है. एक क्रूसीफिक्स जिसमें एक खास पारम्परिक ढंग से यीशु के लिए गीत गाये जाते हैं. हालांकि यह जरूरी नहीं है फिर भी यह धार्मिक समागम आम तौर पर वेदी के पास होता है, जिसमें सत्य और निष्ठा के साथ सम्मान व्यक्त किया जाता है और खास तौर पर व्यक्तिगत रूप से जब प्रभु यीशू के प्रति प्रेम भाव के गीत गाये जा रहे हों.
इसका तीसरा भाग होता है पवित्र प्रभु भोज का, जो इस त्यौहार की अंतिम कड़ी है. यह शुरू होती है आवर फादर के साथ लेकिन "रोटी तोड़ने की रस्म" और इससे संबंधित मंत्र का उच्चारण नहीं किया जाता. पवित्र गुरुवार की प्रार्थना सभा में अभिमंत्रित प्रभु प्रसाद को भक्तों में वितरित किया जाता है.


Mahavir Jayanti

Mahavir is the last and the greatest Tirthankar of the Jain religion, and Mahavir Jayanti is the birth anniversary of Lord Mahavira, the 24th Tirthankara. Mahavir Jayanti is celebrated in the first day of Bhadrapad, when there is a grand cradle procession, and a general celebration of the auspicious day.
The two sects of Jainism, Svetambaras and Digambaras, however, do not come to a consensus on the date of His birth. According to the Digambara sect, his birth took place in 615 BC, whereas the Svetembaras claim that it occurred in 599 BC. 
About Mahavira, his Birth and enlightenment:
According to the Jain mythology, Mahavir had acquired all the necessary qualities to become a Tirthankara in His previous life. Six months prior to his birth, the supreme powers created an atmosphere congenial and conductive to Mahavir's birth, who was a great being. Gods and Goddesses came down to bestow their blessings on the Tirthankara's expecting mother, and to cater to her needs. Wealth was showered from the heavens, relieving everyone from poverty and extending the superior ambience.
Just before Mahavir was born , His mother had sixteen dreams. Mahavir was born at four in the morning, which is considered very auspicious in Jainism and Hinduism.

Her sixteen dreams were:
A white elephant
A lion
Goddess Lakshmi with two elephants at her side showering flowers
The moon lighting the universe with silvery beams
A pair of jumping fish
The radiant sun, a golden pitcher
A lake full of lotus flowers
A calm ocean of milk
A celestial palace
A throne of rubies and diamonds
A celestial king ruling the earth
A garland
A white bull
A fragrant Mandara flowers
and a vase as tall as Mount Meru, filled with gems.
And immediately after this, she felt a white elephant enter her through her mouth. She also didn't feel any pain associated with childbirth.
It is believed that at the exact moment of his birth, the life forms in all the three worlds were cheerful and content. Several gods and goddesses descended from the heavens to pay homage to the Tirthankara. They bathed him ceremonially and named him Vardhaman, Vir, Mahavira, Ativira and Samvati. The child was of exceptional beauty and developed great physical and spiritual strength. At the age of thirty, Mahavir renounced the material world, and sat for meditation. After 12 years of meditation under an Ashoke tree, also called Jonesia Ashoka, he attained the ultimate enlightenment. The divine Gods witnessed this great event, and carried him in a palanquin to a park where he was put on a five-tiered throne and acknowledged as Mahavira. Here he stripped himself of all his clothes. Instead of shaving his head, he tore his hair out from the roots, for he was above pain. According to the Digambaras, Mahavir wore no clothes thereafter, but the Svetambaras believe that Indra presented him with a white robe. 
Mahavir preached non-violence and prohibited any kind of killing. He also believed that the most virtuous life is spent sitting still and fasting, as then a man does not run the risk of injuring life even involuntarily, by swallowing or treading upon insects. On his birth anniversary, every Jain resolves to follow his teachings.


महावीर जयंती

महावीर जैन धर्म के चौंबीसवें तीर्थंकर है। भगवान महावीर का जन्म करीब ढाई हजार साल पहले (ईसा से 599 वर्ष पूर्व), वैशाली के गणतंत्र राज्य क्षत्रिय कुण्डलपुर में हुआ था| महावीर को ‘वीर’, ‘अतिवीर’ और ‘सन्मति’ भी कहा जाता है।
जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी अहिंसा के मूर्तिमान प्रतीक थे। उनका जीवन त्याग और तपस्या से ओतप्रोत था। उन्होंने एक लँगोटी तक का परिग्रह नहीं रखा। हिंसा, पशुबलि, जात-पात का भेद-भाव जिस युग में बढ़ गया, उसी युग में भगवान महावीर का जन्म हुआ। उन्होंने दुनिया को सत्य, अहिंसा का पाठ पढ़ाया, पूरी दुनिया को उपदेश दिए।
उन्होंने दुनिया को जैन धर्म के पंचशील सिद्धांत बताए, जो है- अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य (अस्तेय) और ब्रह्मचर्य। सभी जैन मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका को इन पंचशील गुणों का पालन करना अनिवार्य है| महावीर ने अपने उपदेशों और प्रवचनों के माध्यम से दुनिया को सही राह दिखाई और मार्गदर्शन किया।
जन्म
महावीर का जन्म करीब ढाई हजार साल पहले हुआ था| ईसा से 599 वर्ष पहले वैशाली गणतंत्र के क्षत्रिय कुण्डलपुर में पिता सिद्धार्थ और माता त्रिशला के यहाँ तीसरी संतान के रूप में चैत्र शुक्ल तेरस को वर्द्धमान का जन्म हुआ। यही वर्द्धमान बाद में स्वामी महावीर बने|
जीवन
भगवान महावीर आदेश्वर परमात्मा से प्रारंभ वर्तमान चौबीसी के अंतिम तीर्थंकर थे। प्रभु महावीर की जीवन गाथा यही है कि सिद्धार्थ नंदन, त्रिशला लाल के प्रारंभिक तीस वर्ष राजसी वैभव एवं विलास के दलदल में ‘कमल’ के समान रहे।
मध्य के बारह वर्ष घनघोर जंगल में मंगल साधना और आत्म जागृति की आराधना में, बाद के तीस वर्ष न केवल जैन जगत या मानव समुदाय के लिए अपितु प्राणी मात्र के कल्याण एवं मुक्ति मार्ग की प्रशस्ति में व्यतीत हुए।
जनकल्याण हेतु उन्होंने चार तीर्थों साधु-साध्वी-श्रावक-श्राविका की रचना की। इन सर्वोदयी तीर्थों में क्षेत्र, काल, समय या जाति की सीमाएँ नहीं थीं। भगवान महावीर का आत्म धर्म जगत की प्रत्येक आत्मा के लिए समान था। दुनिया की सभी आत्मा एक-सी हैं इसलिए हम दूसरों के प्रति वही विचार एवं व्यवहार रखें जो हमें स्वयं को पसंद हो। यही महावीर का ‘जीयो और जीने दो’ का सिद्धांत है।
भगवान महावीर आदेश्वर परमात्मा से प्रारंभ वर्तमान चौबीसी के अंतिम तीर्थंकर थे। प्रभु महावीर की जीवन गाथा यही है कि सिद्धार्थ नंदन, त्रिशला लाल के प्रारंभिक तीस वर्ष राजसी वैभव एवं विलास के दलदल में ‘कमल’ के समान रहे।
आज से करीब छब्बीस सौ वर्ष पूर्व भगवान महावीर भारत की पावन माटी पर प्रकट हुए थे। इतने वर्षों के बाद भी भगवान महावीर का नाम स्मरण उसी श्रद्धा और भक्ति से लिया जाता है, इसका मूल कारण यह है कि महावीर ने इस जगत को न केवल मुक्ति का संदेश दिया, अपितु मुक्ति की सरल और सच्ची राह भी बताई। भगवान महावीर ने आत्मिक और शाश्वत सुख की प्राप्ति हेतु पाँच सिद्धांत हमें बताए : सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अचौर्य और ब्रह्मचर्य।