Saturday, March 21, 2015

हिन्दू नव वर्ष का इतिहास व महत्त्व

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को हमारा नववर्ष है।
हम परस्पर उसी दिन एक दुसरे को शुभकामनाये दे
भारतीय नववर्ष का ऐतिहासिक महत्व :
1. यह दिन सृष्टि रचना का पहला दिन है। इस दिन से एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 110 वर्ष पूर्व इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्माजी ने जगत की रचना प्रारंभ की।
2. विक्रमी संवत का पहला दिन: उसी राजा के नाम पर संवत् प्रारंभ होता था जिसके राज्य में न कोई चोर हो, न अपराधी हो, और न ही कोई भिखारी हो। साथ ही राजा चक्रवर्ती सम्राट भी हो।
सम्राट विक्रमादित्य ने 2068 वर्ष पहले इसी दिन राज्य स्थापित किया था।
3. प्रभु श्री राम का राज्याभिषेक दिवस : प्रभु राम ने भी इसी दिन को लंका विजय के बाद अयोध्या में राज्याभिषेक के लिये चुना।
4. नवरात्र स्थापना : शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात्, नवरात्र स्थापना का पहला दिन यही है। प्रभु राम के जन्मदिन रामनवमी से पूर्व नौ दिन उत्सव मनाने का प्रथम दिन।
5. गुरू अंगददेव प्रगटोत्सव: सिख परंपरा के द्वितीय गुरू का जन्म दिवस।
6. समाज को श्रेष्ठ (आर्य) मार्ग पर ले जाने हेतु स्वामी दयानंद सरस्वती ने
इसी दिन को आर्य समाज स्थापना दिवस के रूप में चुना।
7. संत झूलेलाल जन्म दिवस : सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार संत झूलेलाल इसी दिन प्रगट हुए।
8. शालिवाहन संवत्सर का प्रारंभ दिवस : विक्रमादित्य की भांति शालिनवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु
यही दिन चुना।
9. युगाब्द संवत्सर का प्रथम दिन : 5112 वर्ष पूर्व युधिष्ठिर का राज्यभिषेक
भी इसी दिन हुआ।

भारतीय नववर्ष का प्राकृतिक महत्व :
1. वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग,
खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है।
2. फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है।
3. नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के
लिये यह शुभ मुहूर्त होता ह

अत: हमारा नव वर्ष कई कारणों को समेटे हुए है , अंग्रेजी नववर्ष न मना कर भारतीय नववर्ष हर्षोउल्लास के साथ नववर्ष मनाये और दुसरो को भी मनाने के लिए प्रेरित करे |
सभी हिन्दू भाइयों, बहिनों और मित्रों से अनुरोध है, आप भी नवसंवत्सर, नवरात्रि और रामनवमी के इन मांगलिक अवसरों पर अपने अपने घरों को भगवा पताकाओं और आम के पत्तों की वंदनवार से ज़रूर सजाएँ |

नव संवत्सर
विक्रम संवत 2071 का शुभारम्भ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष, उत्तराभाद्रपद नक्षत्र से है। पुराणों के अनुसार इसी तिथि से ब्रह्मा जी ने सृष्टि निर्माण किया था, इसलिए इस पावन तिथि को नव संवत्सर पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। संवत्सर-चक्र के अनुसार सूर्य इस ऋतु में अपने राशि-चक्र की प्रथम राशि मेष में प्रवेश करता है। भारतवर्ष में वसंत ऋतु के अवसर पर नूतन वर्ष का आरम्भ मानना इसलिए भी हर्षोल्लासपूर्ण है क्योंकि इस ऋतु में चारों ओर हरियाली रहती है तथा नवीन पत्र-पुष्पों द्वारा प्रकृति का नव श्रृंगार किया जाता है। लोग नववर्ष का स्वागत करने के लिए अपने घर-द्वार सजाते हैं तथा नवीन वस्त्राभूषण धारण करके ज्योतिषाचार्य द्वारा नूतन वर्ष का संवत्सर फल सुनते हैं। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि के दिन प्रात: काल स्नान आदि के द्वारा शुद्ध होकर हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प और जल लेकर ओम भूर्भुव: स्व: संवत्सर- अधिपति आवाहयामि पूजयामि च इस मंत्र से नव संवत्सर की पूजा करनी चाहिए तथा नववर्ष के अशुभ फलों के निवारण हेतु ब्रह्मा जी से प्रार्थना करनी चाहिए कि ‘हे भगवन! आपकी कृपा से मेरा यह वर्ष कल्याणकारी हो और इस संवत्सर के मध्य में आने वाले सभी अनिष्ट और विघ्न शांत हो जाएं।’ नव संवत्सर के दिन नीम के कोमल पत्तों और ऋतुकाल के पुष्पों का चूर्ण बनाकर उसमें काली मिर्च, नमक, हींग, जीरा, मिश्री, इमली और अजवायन मिलाकर खाने से रक्त विकार आदि शारीरिक रोग शांत रहते हैं और पूरे वर्ष स्वास्थ्य ठीक रहता है।

राष्ट्रीय संवत
भारतवर्ष में इस समय देशी विदेशी मूल के अनेक संवतों का प्रचलन है किंतु भारत के सांस्कृतिक इतिहास की द्दष्टि से सर्वाधिक लोकप्रिय राष्ट्रीय संवत यदि कोई है तो वह विक्रम संवत ही है। आज से लगभग 2,068 वर्ष यानी 57 ईसा पूर्व में भारतवर्ष के प्रतापी राजा विक्रमादित्य ने देशवासियों को शकों के अत्याचारी शासन से मुक्त किया था। उसी विजय की स्मृति में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि से विक्रम संवत का भी आरम्भ हुआ था। प्राचीनकाल में नया संवत चलाने से पहले विजयी राजा को अपने राज्य में रहने वाले सभी लोगों को ऋण-मुक्त करना आवश्यक होता था। राजा विक्रमादित्य ने भी इसी परम्परा का पालन करते हुए अपने राज्य में रहने वाले सभी नागरिकों का राज्यकोष से कर्ज़ चुकाया और उसके बाद चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से मालवगण के नाम से नया संवत चलाया। भारतीय कालगणना के अनुसार वसंत ऋतु और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि अति प्राचीनकाल से सृष्टि प्रक्रिया की भी पुण्य तिथि रही है। वसंत ऋतु में आने वाले वासंतिक नवरात्र का प्रारम्भ भी सदा इसी पुण्यतिथि से होता है। विक्रमादित्य ने भारत राष्ट्र की इन तमाम कालगणनापरक सांस्कृतिक परम्पराओं को ध्यान में रखते हुए ही चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि से ही अपने नवसंवत्सर संवत को चलाने की परम्परा शुरू की थी और तभी से समूचा भारत राष्ट्र इस पुण्य तिथि का प्रतिवर्ष अभिवंदन करता है। दरअसल, भारतीय परम्परा में चक्रवर्ती राजा विक्रमादित्य शौर्य, पराक्रम तथा प्रजाहितैषी कार्यों के लिए प्रसिद्ध माने जाते हैं। उन्होंने 95 शक राजाओं को पराजित करके भारत को विदेशी राजाओं की दासता से मुक्त किया था। राजा विक्रमादित्य के पास एक ऐसी शक्तिशाली विशाल सेना थी जिससे विदेशी आक्रमणकारी सदा भयभीत रहते थे। ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, कला संस्कृति को विक्रमादित्य ने विशेष प्रोत्साहन दिया था। धंवंतरि जैसे महान वैद्य, वराहमिहिर जैसे महान ज्योतिषी और कालिदास जैसे महान साहित्यकार विक्रमादित्य की राज्यसभा के नवरत्नों में शोभा पाते थे। प्रजावत्सल नीतियों के फलस्वरूप ही विक्रमादित्य ने अपने राज्यकोष से धन देकर दीन दु:खियों को साहूकारों के कर्ज़ से मुक्त किया था। एक चक्रवर्ती सम्राट होने के बाद भी विक्रमादित्य राजसी ऐश्वर्य भोग को त्यागकर भूमि पर शयन करते थे। वे अपने सुख के लिए राज्यकोष से धन नहीं लेते थे।

राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान
पिछले दो हज़ार वर्षों में अनेक देशी और विदेशी राजाओं ने अपनी साम्राज्यवादी आकांक्षाओं की तुष्टि करने तथा इस देश को राजनीतिक द्दष्टि से पराधीन बनाने के प्रयोजन से अनेक संवतों को चलाया किंतु भारत राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान केवल विक्रमी संवत के साथ ही जुड़ी रही। अंग्रेज़ी शिक्षा-दीक्षा और पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव के कारण आज भले ही सर्वत्र ईस्वी संवत का बोलबाला हो और भारतीय तिथि-मासों की काल गणना से लोग अनभिज्ञ होते जा रहे हों परंतु वास्तविकता यह भी है कि देश के सांस्कृतिक पर्व-उत्सव तथा राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, गुरु नानक आदि महापुरुषों की जयंतियाँ आज भी भारतीय काल गणना के हिसाब से ही मनाई जाती हैं, ईस्वी संवत के अनुसार नहीं। विवाह-मुण्डन का शुभ मुहूर्त हो या श्राद्ध-तर्पण आदि सामाजिक कार्यों का अनुष्ठान, ये सब भारतीय पंचांग पद्धति के अनुसार ही किया जाता है, ईस्वी सन् की तिथियों के अनुसार नहीं।

मां विंध्यवासिनी देवी मंदिर

विंध्याचल मंदिर पौराणिक नगरी काशी से लगभग 50 किलोमीटर दूर विंध्य की मनोरम पर्वत शृंखलाओं की गोद में स्थित है। मीरजापुर के विंध्याचल रेलवे स्टेशन के निकट गंगाजी के पास बसी हुई बस्ती के बीचोबीच स्थित मां विंध्यवासिनी का दिव्य स्थल युगों युगों से आस्था का केंद्र है। 
हम कई बार मां के चरणों में शीष झुकाने जाते हैं, लेकिन नवरात्रकाल में यहां के दिव्य दर्शन की अनुभूति आज भी तनमन को पुलकित कर देती है। यहां आदि अनादि काल से मां विंध्यवासिनी आद्य महाशक्ति निवास करती हैं।  
मान्यता तो यह है कि त्रिकोण यंत्र पर स्थित विंध्याचल क्षेत्र का अस्तित्व सृष्टि से पूर्व का है तथा प्रलय के बाद भी समाप्त नहीं हो सकता, क्योंकि यहां महालक्ष्मी, महाकाली व महासरस्वती स्वरूपा आद्यशक्ति मां विंध्यवासिनी विराजमान हैं। यहां सुर्योदय से पहले मां के धाम जाकर सबसे पहले गंगा स्नान किया जाता है और  फिर 'जय माता दी का उद्घोष करते हुए दिव्य धाम मां विंध्यवासिनी के दर्शन किया जाता है। इस पुण्य स्थल का वर्णन पुराणों में तपोभूमि के रूप में किया गया है। यहां सिंह पर आरूढ़ देवी का विग्रह ढाई हाथ लंबा है। इस बारे में अनेक मान्यताएं हैं। 
कहा जाता है कि श्रीमददेवीभगवत  के दसवें स्कंध में सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने सबसे पहले स्वयंभुवमनु तथा शतरूपा को प्रकट किया। स्वयंभुवमनु ने देवी की मूर्ति बनाकर सौ वर्षों तक कठोर तप किया, जिससे प्रसन्न हो भगवती ने उन्हें निष्कंटक राज्य, वंश-वृद्धि, परमपद का आशीर्वाद दिया। वर देकर महादेवी विंध्याचल पर्वत पर चलीं गईं, तभी से ही मां विंध्यवासिनी की पुजा होती आ रही है।  
त्रेतायुग में श्रीराम ने यहीं पर देवी पुजा कर रामेश्वर महादेव की स्थापना की, जबकि द्वापर में वसुदेव के कुल पुरोहित गर्ग ऋषि ने कंस वध एवं श्रीकृष्णावतार हेतु विंध्याचल में लक्षचंडी का अनुष्ठान किया था। 
मार्कण्डेय पुराण में वर्णित दुर्गासप्तशती (देवी माहात्म्य) के ग्यारहवें अध्याय के 41-42 श्लोकों में मां भगवती कहती हैं 'वैवस्वत मन्वंतर के 28वें युग में शुंभ-निशुंभ नामक महादैत्य उत्पन्न होंगे, तब मैं नंदगोप के घर उनकी पत्नी यशोदा के गर्भ में आकर विंध्याचल जाऊंगी और महादैत्यों का संहार करूंगी। श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में श्रीकृष्ण जन्माख्यान में वर्णित है कि देवकी के आठवें गर्भ से आविर्भूत श्रीकृष्ण को वसुदेवजी ने कंस के भय से रातोंरात यमुना नदी पार कर नंद के घर पहुंचाया तथा वहां से यशोदा नंदिनी के रूप में जन्मी योगमाया को मथुरा ले आए। आठवीं संतान के जन्म की सूचना मिलते ही कंस कारागार पहुंचा। उसने जैसे ही उन्हें पत्थर पर पटकना चाहा। वह उसके हाथों से छूट आकाश में पहुंची और अपने दिव्य स्वरूप को दर्शाते हुए कंस वध की भविष्यवाणी कर विंध्याचल लौट गई। 
माता विंध्यवासिनी विंध्य पर्वत पर मधु और कैटभ नामक असुरों का नाश करने वाली भगवती यंत्र की अधिष्ठात्री हैं। यहां संकल्प मात्र से उपासकों को सिद्धि प्राप्त हो जाती है, यही कारण है कि इन्हें सिद्धिदात्री भी कहा जाता हैं। वैसे तो आदिशक्ति की लीला भूमि विंध्यवासिनी धाम में पुरे साल श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, पर शारदीय व चैत्र नवरात्र में यहां देश के कोने कोने से मां के भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है। 
मान्यता तो यह भी है कि शारदीय व वासंतिक नवरात्र में मां भगवती नौ दिनों तक मंदिर की छत के ऊपर पताका में ही विराजमान रहती हैं। सोने के इस ध्वज की विशेषता यह है कि यह सूर्य चंद्र पताकिनी के रूप में जाना जाता है। यह निशान सिर्फ मां विंध्यवासिनी के पताका में ही होता है। ऋषियों की माने तो देवी के ध्यान में स्वर्णकमल पर विराजी, त्रिनेत्रा, कांतिमयी, चारों हाथों में शंख, चक्र, वर और अभय मुद्रा धात्री, पूर्णचंद्र की सोलह कलाओं से परिपूर्ण, गले में वैजयंती माला, बाहों में बाजूबंद और कानों में मकराकृति कुंडल धात्री, इंद्रादि देवताओं द्वारा पूजित चंद्रमुखी परांबा विंध्यवासिनी का स्मरण होना चाहिए, जिनके सिंहासन के बगल में ही उनका वाहन स्वरूप महासिंह है।  
त्रिकोण यंत्र के पश्चिम कोण पर उत्तर दिशा की तरफ मुख किए हुए अष्टभुजी देवी विराजमान हैं। अपनी अष्टभुजाओं से सब कामनाओं को पुरा करती हुई वह संपूर्ण दिशाओं में स्थित भक्तों की आठ भुजाओं से रक्षा करती हैं। कहा जाता है कि वहां अष्टदल कमल आच्छादित है, जिसके ऊपर सोलह, फिर चौबीस दल हैं, बीच में एक बिंदु है, जिसके अंदर ब्रह्मरूप में महादेवी अष्टभुजी निवास करती हैं। यहां से मात्र तीन किलोमीटर दूर 'काली खोह नामक स्थान पर महाकाली स्वरूपा चामुंडा देवी का मंदिर है, जहां देवी का विग्रह बहुत छोटा लेकिन मुख विशाल है। इनके पास भैरवजी का स्थान है। ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष की षष्ठी तिथि में विंध्यवासिनी के दर्शन और पूजन का अतिशय माहात्म्य माना गया है। 
यहां के लोगों का सरल जीवन मां भगवती की भक्ति से ओतप्रोत है। 


Wednesday, March 18, 2015

Solar Impulse 2

The world's only 'zero-fuel' aircraft 'Solar Impulse-2' today landed in Varanasi for an overnight stopover after its pilot held the Ahmedababd 'administration' responsible for the delay in departure from the city for want of customs and immigration clearance. 
Swiss pilot Bertrand Piccard, who had flown the airplane from Muscat to Ahmedabad, did not get clearance from the Immigration department. 
His co-pilot Andre Borschberg today flew the world's first solar-powered aircraft from Ahmedabad to Varanasi. 
The plane touched down at the Lal Bahadur Shastri International Airport at Babatpur shortly after 8:30 PM, completing an over 13 hour-long journey from Ahmedabad, where the plane and the crew had a week's stopover, an official said here. 
"The plane took off from Ahmedabad after a delay of two hours from its scheduled time," the official said. 
It was slated to hover above river Ganga to spread the message of cleanliness and clean energy, but it was skipped due to the delay. 
Airport Director S K Malik and other senior officials gave a warm welcome to Borschberg. 
The SI-2 is scheduled to fly to Mandalay in Myanmar from here tomorrow morning, Chongqing and Nanjing in China and thereafter to the US.





Friday, March 13, 2015

चैत्र नवरात्र (Chaitra Navratri)

हिन्दू धर्म में माता दुर्गा को आदिशक्ति कहा जाता है। शक्तिदायिनी मां दुर्गा की आराधना के लिए साल के दो वर्ष बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यह दो समय होते हैं चैत्र नवरात्र और शारदीय नवरात्र। चैत्र नवरात्र चैत्र माह में मनाया जाता है। जबकि शारदीय नवरात्र आश्विन माह में मनाया जाता है।
चैत्र नवरात्र 2015
इस साल चैत्र नवरात्र 21 मार्च से शुरू होंगे और 29 मार्च को खत्म होंगे। चैत्र नवरात्र की मुख्य तिथियां निम्न हैं: 
21 मार्च 2015 (1st Day of Navratri): इस दिन घटस्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 06 बजकर 28 मिनट से लेकर 07 बजकर 35 मिनट तक का है। नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। 
22 मार्च 2015 (2nd Day of Navratri): नवरात्र के दूसरे दिन देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। 
23 मार्च 2015 (3rd Day of Navratri): नवरात्र के तीसरे दिन देवी दुर्गा के चन्द्रघंटा रूप की आराधना की जाती है। इस साल तृतीया और चतुर्थी दिवस एक होने के कारण 23 तारीख को ही माता के चौथे स्वरूप देवी कूष्मांडा जी की आराधना की जाएगी। 
24 मार्च 2015 (5th Day of Navratri): नवरात्र के पांचवें दिन भगवान कार्तिकेय की माता स्कंदमाता की पूजा की जाती है। 
25 मार्च 2015 (6th Day of Navratri): नारदपुराण के अनुसार शुक्ल पक्ष यानि चैत्र नवरात्र के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा करनी चाहिए। 
26 मार्च 2015 (7th Day of Navratri): नवरात्र के सातवें दिन मां कालरात्रिकी पूजा का विधान है। 
27 मार्च 2015 (8th Day of Navratri): नवरात्र के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है। इस दिन कई लोग कन्या पूजन भी करते हैं। 
28 मार्च 2015 (9th Day of Navratri): नौवें दिन भगवती के देवी सिद्धदात्रीस्वरूप का पूजन किया जाता है। सिद्धिदात्री की पूजा से नवरात्र में नवदुर्गा पूजा का अनुष्ठान पूर्ण हो जाता है। 
29 मार्च 2015: नवरात्र की दशमी को नवरात्रि का समापन हो जाता है। 



Wednesday, March 11, 2015

Friday, March 6, 2015

गुझिया

गुझिया (अन्य नामः गुजिया, गुंजिया) एक प्रकार का पकवान है जो मैदे और खोए से बनाया जाता है। इसे छत्तीसगढ़ में कुसली , महाराष्ट्र में करंजी, बिहार में पिड़की, आंध्र प्रदेश में कज्जिकयालु, कहते हैं। उत्तर भारत में होली तथा दक्षिण भारत में दीपावली के अवसर पर घर में गुझिया बनाने की परंपरा है। गुझिया मुख्य रूप से दो तरह से बनाई जातीं है, एक- मावा भरी गुझिया, दूसरी रवा भरी गुझिया। मावा इलायची भरी गुझिया के ऊपर चीनी की एक परत चढ़ाकर वर्क लगाकर इसको एक नया रूप भी देते हैं। मावा के साथ कभी कभी हरा चना, मेवा या दूसरे खाद्य पदार्थ मिलाकर, जैसे अंजीर या खजूर की गुझिया भी बनाई जाती हैं।